हल्द्वानी बनभूलपुरा अतिक्रमण मामला: उत्तराखंड के बहुचर्चित हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला या महत्वपूर्ण निर्देश आ सकता है। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ में इस मुकदमे को सुनवाई सूची में तीसरे नंबर पर रखा गया है। पूर्व में क्रम संख्या अधिक होने के चलते मामले पर विस्तृत सुनवाई नहीं हो पा रही थी, जिसके बाद रेलवे और राज्य सरकार के वकीलों ने शीघ्र सुनवाई का विशेष अनुरोध किया था।
संभावित फैसले को देखते हुए उत्तराखंड गृह विभाग ने जिला और पुलिस प्रशासन को क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखने के कड़े निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शासन स्तर पर पहले ही अदालत में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
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हल्द्वानी बनभूलपुरा अतिक्रमण के दोनों पक्षों का रुख
- स्थानीय निवासियों का पक्ष: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वे यहां दशकों से, कुछ परिवार तो आजादी से पहले से बसे हुए हैं। उनके पास हाउस टैक्स रसीदें, बिजली-पानी के कनेक्शन और आधिकारिक पते के प्रमाण मौजूद हैं। उनका मुख्य आधार मानवीय दृष्टिकोण और उचित पुनर्वास योजना के बिना बेदखली पर रोक की मांग है।
- रेलवे और सरकार का पक्ष: रेलवे के अनुसार यह जमीन 1959 के रेलवे लैंड प्लान और 1972 के राज्य अभिलेखों के तहत वैध रेलवे संपत्ति है। रेलवे ने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि उनके पास अतिक्रमणकारियों को पुनर्वास या मुआवजा देने की कोई विभागीय नीति नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट की पूर्व टिप्पणी: जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के ध्वस्तीकरण आदेश पर रोक लगाते हुए कहा था कि हजारों लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता। जुलाई 2024 में शीर्ष अदालत ने केंद्र, राज्य और रेलवे को बैठक कर प्रभावित परिवारों की पहचान और पुनर्वास की व्यवहार्यता पर योजना तैयार करने को कहा था।
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बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले का कानूनी सफर: 2007 से अब तक
- 2007–2013: हाईकोर्ट के आदेश पर शुरुआती कार्रवाई हुई। वर्ष 2013 में याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी द्वारा गौला नदी खनन और पुल क्षति मामले में दायर याचिका के दौरान रेलवे भूमि पर बड़े पैमाने पर कब्जे का मुद्दा पुनः उठा।
- 2016–2017: 9 नवंबर 2016 को हाईकोर्ट ने 10 सप्ताह में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए। राज्य सरकार और निवासियों द्वारा जमीन को नजूल भूमि बताने का दावा हाईकोर्ट ने खारिज किया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जहां से तथ्यों के परीक्षण हेतु पुनः हाईकोर्ट भेजा गया।
- मार्च 2022–दिसंबर 2022: अतिक्रमण न हटने पर नई याचिका दायर हुई। 20 दिसंबर 2022 को हाईकोर्ट ने कब्जा हटाने का कड़ा आदेश जारी किया।
- जनवरी 2023 से वर्तमान: प्रभावित पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां ध्वस्तीकरण पर रोक लगी। अब 9 सितंबर की तारीख पर सभी पक्षों की निगाहें टिकी हैं।


