उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति केवल देवी-देवताओं, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के जनजीवन में अनेक ऐसे पारंपरिक विश्वास भी प्रचलित रहे हैं जो प्रकृति, वास्तु और दैनिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हीं लोकविश्वासों में एक महत्वपूर्ण शब्द है “बेध” अथवा “भेद”। यह शब्द उत्तराखण्ड के ग्रामीण समाज में लंबे समय से प्रचलित है और आज भी कई क्षेत्रों में लोग इसे गंभीरता से मानते हैं।
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क्या होता है “बेध” या “भेद” ?
“बेध” शब्द का सामान्य अर्थ होता है ,भेदना या आर-पार होना। किन्तु लोकविश्वासों में इसका लक्ष्यार्थ “अनिष्टकारी प्रभाव” माना जाता है। अर्थात ऐसी स्थिति, वस्तु या संरचना जो किसी घर, परिवार या व्यक्ति के लिए अशुभ या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करे।
उत्तराखण्ड की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी घर के सामने, ऊपर या आसपास कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएँ या संरचनाएँ हों, तो वे उस घर का “वेधन” करती हैं और इससे परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
किन स्थितियों को माना जाता है “बेध” ?
पहाड़ी समाज में अनेक प्रकार की अवस्थाओं को “बेध” की श्रेणी में रखा गया है। उदाहरणस्वरूप —
- दो जुड़े हुए मकानों में यदि पश्चिम दिशा वाला भवन पूर्व दिशा वाले भवन से अधिक ऊँचा हो।
- घर के ठीक सामने विशाल पीपल, तून या सिलिंग जैसे बड़े वृक्ष का होना।
- घर से सीधे श्मशान घाट का दिखाई देना।
- घर के मुख्य द्वार के सामने तीखा पहाड़ी किनारा या चट्टान होना।
- किसी भवन पर लगातार दूसरे भवन की छाया पड़ना।
लोकमान्यता के अनुसार ऐसी परिस्थितियाँ घर की सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
“बेध” से बचने के पारंपरिक उपाय –
उत्तराखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग “बेध” के प्रभाव को दूर करने के लिए अनेक पारंपरिक उपाय अपनाते रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं —
- घर की धुरी (पहाड़ी मकानों की दोनों ढलानदार छतों के मध्य भाग) में डाँसी अर्थात ग्रेनाइट का पत्थर रखना।
- घर के आगे थूहर या अन्य कांटेदार पौधे लगाना।
- कुछ स्थानों पर विशेष प्रतीकात्मक पत्थर या लकड़ी का टुकड़ा स्थापित करना।
- वास्तु अनुकूल दिशा में प्रवेश द्वार बनाना।
इन उपायों का उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जा या अनिष्टकारी प्रभाव को रोकना माना जाता था।
वास्तु और ज्योतिष से भी जुड़ी है मान्यता
स्थानीय विद्वानों और लोकपरंपराओं में यह विश्वास भी प्रचलित है कि “बेध” का उल्लेख वास्तुशास्त्र और ज्योतिषीय ग्रंथों में भी मिलता है। भारतीय वास्तु सिद्धांतों में भवन के सामने वृक्ष, मार्ग, श्मशान या ऊँची संरचना को कई बार अशुभ माना गया है। यही अवधारणा पहाड़ के लोकजीवन में “बेध” के रूप में विकसित हुई प्रतीत होती है।
पांडव नृत्य में भी मिलता है “बेध” का उल्लेख
गढ़वाल के प्रसिद्ध लोकानुष्ठान “पांडवर्त” या पांडव नृत्य में भी “बेध” की यह मान्यता दिखाई देती है। लोककथा के अनुसार जब पांडव अपने वनवास काल में दुधियानाग के राज्य में रह रहे थे, तब उन्होंने देखा कि उनके निवास के सामने खड़ा विशाल सिलिंग वृक्ष उनके घर का वेधन कर रहा है।
पांडवों ने उस वृक्ष को कटवा दिया। किंतु वह वृक्ष दुधियानाग के लिए अत्यंत प्रिय था। वृक्ष काटे जाने पर दुधियानाग और पांडवों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने मध्यस्थता कर दोनों पक्षों को शांत कराया।
यह प्रसंग दर्शाता है कि “बेध” की अवधारणा केवल वास्तु तक सीमित नहीं थी, बल्कि लोककथाओं और धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान था।
लोकविश्वास और आधुनिक दृष्टिकोण-
आज के वैज्ञानिक युग में कई लोग “बेध” जैसी मान्यताओं को अंधविश्वास मानते हैं, जबकि कुछ लोग इन्हें पारंपरिक वास्तु ज्ञान और मनोवैज्ञानिक संतुलन से जोड़कर देखते हैं। पहाड़ों में बड़े वृक्षों से घरों पर गिरने का खतरा, सूर्यप्रकाश रुकना या नमी बढ़ना जैसी व्यावहारिक समस्याएँ भी इन मान्यताओं के पीछे कारण रही होंगी।
फिर भी यह सत्य है कि “बेध” उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति, वास्तु परंपरा और सामुदायिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यह लोकविश्वास हमें बताता है कि पहाड़ का समाज प्रकृति, दिशा, पर्यावरण और मानवीय जीवन के संबंधों को कितनी गंभीरता से समझता था।
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