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श्री देव सुमन जी के बलिदान दिवस पर उनकी अमर जीवन गाथा –
व्यक्तिगत जानकारी
- नाम: श्री देव सुमन
- पिता का नाम: हरिराम बडोनी
- माता का नाम: श्रीमती तारा देवी
- पत्नी: श्रीमती विनय लक्ष्मी सकलानी
- जन्मतिथि: 25 मई 1916
- जन्म स्थान: ग्राम – जौल, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड
- कार्य: स्वतंत्रता सेनानी
- मृत्यु: 25 जुलाई 1944
श्रीदेव सुमन जी राजशाही के विरुद्ध आंदोलन करके शहीद होने वाले, उत्तराखंड के पहले आंदोलनकारी थे। आइये जानते हैं श्रीदेव सुमन जी के बारे में।
श्री देव सुमन जी का प्रारम्भिक जीवन –
श्री देव सुमन जी का जन्म टिहरी गढ़वाल के जौल नामक ग्राम में 25 मई 1916 को हुआ था। इनके पिता श्री हरिराम बडोनी अपने क्षेत्र के लोकप्रिय वैद्य थे। माता श्रीमती तारा देवी एक कुशल गृहणी थी। श्रीदेव सुमन का बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था। सन 1919 में हैजे का प्रकोप फैलने पर श्री हरिराम बडोनी मरीजों की सेवा करते हुए स्वयं हैजे का शिकार हो गए और 36 साल की उम्र में ही चल बसे।
मगर इनकी माता ने अपने बच्चों का लालन-पालन किया।
इनकी आरम्भिक शिक्षा अपने पैतृक गांव व चम्बाखाल में हुई। 1931 में इन्होंने टिहरी से हिंदी मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1931 में ये देहरादून गए और वहाँ के नेशनल स्कूल में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया, और साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहे। पंजाब विश्वविद्यालय से इन्होंने रत्न, भूषण, प्रभाकर परीक्षाओं को उत्तीर्ण किया। इसके साथ-साथ, विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षा भी उत्तीर्ण की।
श्री देव सुमन जी की साहित्यिक जीवन यात्रा –
श्री देव सुमन ने 1937 में सुमन सौरभ नाम से अपनी कविताएं प्रकाशित कराईं। इन्होंने अखबार हिन्दू और समाचार पत्र धर्मराज्य में भी कार्य किया। इन्होंने इलाहाबाद में राष्ट्र मत नामक अखबार में सहकारी संपादक के रूप में कार्य किया। इस प्रकार श्री देव सुमन साहित्य के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ने लगे। जनता की सेवा के उद्देश्य से इन्होंने 1937 में हिमालय सेवा संघ की स्थापना की, जो आगे चलकर प्रसिद्ध हुआ।
श्री देव सुमन जी की सामाजिक जीवन यात्रा –
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और टिहरी रियासत के विरुद्ध आंदोलन में श्रीदेव सुमन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1938 में वे गढ़वाल की यात्रा पर गए और श्रीनगर में आयोजित राजनैतिक सम्मेलन में शामिल हुए। इस सम्मेलन में नेहरू जी भी आए थे, और श्रीदेव सुमन ने उन्हें गढ़वाल की खराब स्थिति के बारे में अवगत कराया।
इसी राजनैतिक सम्मेलन से इन्होंने गढ़वाल की एकता का नारा मजबूत किया। श्रीदेव सुमन ने जगह-जगह यात्रा करके जन जागरण फैलाना शुरू कर दिया। 23 जनवरी 1939 को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की गई, और श्रीदेव सुमन जी संयोजक मंत्री चुने गए। हिमालय सेवा संघ द्वारा पर्वतीय राज्यों में जागृति और चेतना लाने का काम किया। लैंड्सडाउन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका कर्मभूमि में इन्होंने सह-संपादक के रूप में कई जन जागृति के लेख लिखे।
इसके बाद इन्होंने हिमांचल नामक पुस्तक छपवाकर टिहरी रियासत में बटवाई, जिससे ये रियासत के नजर में आ गए। रियासत ने इन्हें कई प्रकार के प्रलोभन भी दिए, मगर ये नहीं बदले। 1942 अगस्त में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तब इन्हें 29 अगस्त 1942 को देवप्रयाग में गिरफ्तार कर, 10 दिन तक मुनिकीरेती जेल भेज दिया।
बाद में 06 सितंबर 1942 को देहरादून जेल भेज दिया गया, और वहाँ से आगरा जेल में शिफ्ट किया गया। 15 माह जेल में रहने के बाद 19 नवंबर 1943 को ये रिहा हुए। इसी बीच टिहरी रियासत ने जनता के ऊपर जुल्मों की सारी हदें पार कर दी थीं। श्रीदेव सुमन टिहरी की जनता के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे। इन्होंने जनता और रियासत के बीच सम्मानजनक संधि का प्रस्ताव भी दरबार को भेजा, लेकिन रियासत ने इसे अस्वीकार कर दिया।
श्री देव सुमन जी का ऐतिहासिक अनशन और बलिदान –
29 दिसंबर 1943 को श्री देव सुमन को चम्बाखाल में गिरफ्तार करके, 30 दिसंबर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया। टिहरी जेल में श्री देव सुमन जी के साथ नारकीय व्यवहार किया गया। इनके ऊपर झूठा मुकदमा चलाकर 31 जनवरी 1944 को इन्हें 2 साल का कारावास और 200 रुपये दंड देकर अपराधी बना दिया गया। इसके बाद भी इनके साथ नारकीय व्यवहार जारी रहा। अंत में श्री देव सुमन ने 3 मई 1944 को ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया।
जेल प्रशासन ने इनका मनोबल तोड़ने के लिए कई मानसिक और शारीरिक अत्याचार किए, लेकिन ये अपने अनशन पर डटे रहे। जेल में इनके अनशन की खबर से जनता परेशान हो गई, लेकिन रियासत ने अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है, और राजा के जन्मदिन पर इन्हें रिहा कर दिया जाएगा। यह खबर इनको भी मिली, लेकिन उन्होंने कहा कि वे प्रजामंडल को रजिस्टर्ड किए बिना अपना अनशन खत्म नहीं करेंगे।
श्री देव सुमन की मृत्यु –
अनशन से उनकी हालत बिगड़ गई, और जेल प्रशासन ने अफवाह फैला दी कि उन्हें न्यूमोनिया हो गया। इसके बाद उन्हें कुनैन के इंजेक्शन लगाए गए। कुनैन के इंजेक्शन के साइड इफेक्ट से उनके शरीर में खुश्की फैल गई, जिसकी वजह से वे पानी के लिए तड़पने लगे। श्रीदेव सुमन “पानी-पानी” चिल्लाते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें पानी नहीं दिया। अंततः तड़पते हुए और रियासत के जुल्मों से लड़ते हुए इन्होंने 25 जुलाई 1944 को अपने देश, अपने राज्य उत्तराखंड, और अपनी पहाड़ी संस्कृति के लिए अपने प्राण त्याग दिए।
श्री देव सुमन की शहादत का प्रभाव –
श्री देव सुमन की शहादत की खबर से जनता में उबाल आ गया। जनता ने रियासत के खिलाफ खुलकर विद्रोह शुरू कर दिया। इस आंदोलन के बाद टिहरी रियासत को प्रजामंडल को वैधानिक करना पड़ा। मई 1947 में टिहरी प्रजामंडल का पहला अधिवेशन हुआ। जनता ने 1948 में टिहरी, देवप्रयाग, और कीर्तिनगर पर अपना अधिकार कर लिया। अंततः 01 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य भारत गणराज्य में विलीन हो गया।
निष्कर्ष –
हमें गर्व है श्री देव सुमन और उनकी शहादत पर। मात्र 29 वर्ष की छोटी सी उम्र में श्रीदेव सुमन अपने राज्य, अपने पहाड़ी समाज, अपने टिहरी गढ़वाल, और अपने देश के लिए ऐसा कार्य कर गए, जिससे उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में सदा-सदा के लिए अमर हो गया।
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