Wednesday, April 2, 2025
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कराचिल अभियान ! मुहमद तुगलक का पहाड़ जीतने का अधूरा सपना !

Karachil abhiyan

कराचिल अभियान के तहत मुहमद तुगल ने लाखों की विशाल सेना के साथ खुसरो मलिक को हिमालयी राज्य विजय करने हेतु भेजा था। मुहमद तुगलक ने हिमालयी राज्यों पर सन 1328 में आक्रमण किया था। उसने एक विशाल सेना को हिमालयी राज्यों या एक खास राज्य को जीतने भेजा था। लेखकों ने मुहमद बिन तुग़लक के इस अभियान को कराचल, काराचल, करजल, काराजिल, कराजील आदी अलग -अलग नाम दिए हैं।

कहाँ था कराचिल राज्य –

कराचिल अभियान के बारे में तत्कालीन अफ्रीकन पर्यटक इब्नबतूता ने कराचल अभियान का विवरण कुछ इस प्रकार दिया है , ‘यह हिमालय का एक भाग था। यहां दिल्ली से लगभग प्रकार है- इसके अनुसार कराचल पर्वतीय घाटियों एवं नदी की गहरी खाइयों से युक्त एक पर्वतीय राज्य था। यहाँ 10 दिन में पहुंचा जाता था। इसका धरातल संकरी था। राज्य के दक्षिणीभाग में कृषियोग्य उत्तम भूमि थी जिस पर वहां के लोग कृषि किया करते थे। यहाँ के निवासियों की आजीविका कृषि एवं पशु (भेड़-बकरी पालन से चलती थी। यहाँ भोज्य पदार्थों का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता था।

पर्वत श्रेणी के पादप्रदेश में जिदिया नगर था तथा मध्य में ऊंची पहाड़ी पर वारंगल नामक नगर था। राज्य में प्रवेश करने का एक ही मार्ग था, जो बहुत ही संकरा था। रास्ते के नीचे की ओर नदी की गहरी घाटी थी तथा ऊपर की ओर सीधा पर्वत था। मार्ग इतना संकरा था कि उससे केवल एक ही घुड़सवार एक बार में आगे बढ़ सकता था। एक बार में आगे बढ़ सकता था। वारंगल इसी मार्ग पर स्थित राज्य के सीमान्त पर समेहल नामक स्थान पर एक बौद्ध मंदिर था।

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जहां चीनी यात्री दर्शन करने आते थे। ऊंचे पर्वतीय भाग में जहां वारंगल था वहां पर वर्षाकाल में घोर वर्षा होती थी, इतनी कि जितनी पर्वत श्रेणी के पादप्रदेश में भी नहीं होती थी। पहाड़ी ढालों पर, जिनसे होकर संकीर्ण मार्ग जाता था, बड़े आकार वाले वृक्षों के वन थे। और कराचल के नरेश की गणना महान् शक्तिशाली हिन्दू नरेशों में की जाती थी। उसके राज्य में सोने की खानें थी तथा कस्तूरी मृग मिलता था। वहां पर अनेक प्रकार के खनिज व बहुमूल्य रत्न भी मिलते थे।

फ्लॉप हुवा कराचिल अभियान पहाड़ों में नहीं टिक पाई मुस्लिम सेना –

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इतिहासकारों  ने जिदिया की पहचान ‘चण्डिला’ के रूप में चांदपुर या हरिद्वार के निकटस्थ चण्डीघाट से तथा वारंगल की पहचान श्रीनगर के निकटस्थ देवलगढ़ से करते हैं। इतिहासकार डबराल जी ने करांचल को केदारखंड राज्य माना है। कई इतिहासकारों ने इसे आधुनिक कुमाऊं माना है। अफ्रीकन पर्यटक इब्नबतूता ने माना है कि कराचील अभियान मुहमद तुगलग की बहुत बड़ी गलती थी। उसने पहाड़ी राज्यों को जितने के लिए एक विशाल  सेना तो भेजी लेकिन ,वह सेना पहाड़ी जंगली रास्तों पर भटक गई। पहाड़ी भौगोलिक राज्यों में तुगलक की सेना बुरी तरह मात खा गई। इत्तिहासकर इबनबबूता के अनुसार इस अभियान से केवल दस सैनिक ही जिन्दा वापस लौटे थे।

संदर्भ – उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक व इंटरनेट विकिपीडिया पर प्राप्त जानकारी के आधार पर

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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