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छोपती नृत्य गढ़वाल का प्रसिद्ध लोकनृत्य ।

chhopti dance Uttarakhand

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छोपती नृत्य

छोपती गीत क्या है –

छोपती गीत या छोपती नृत्य ( chhopti dance ) गढ़वाल का एक लोक नृत्य है। वर्तमान में यह लोक नृत्य केवल रवाई घाटी और जौनपुर तक ही सिमित रह गया है।इस नृत्य में पहले और तीसरे नर्तक के हाथ दूसरे नर्तक के कमर के पीछे जुड़े होते है।हाथों के जुड़ाव की गोल श्रृंखला नर्तक कंधे से कंधा मिलाकर जुड़े रहते हैं। इस स्थिति में सबके पैर दो कदम आगे और एक क़दम पीछे चलते हैं। इस नृत्य के साथ गाये जाने वाला गीत छोपती गीत कहा जाता है।

ये गीत मुख्यतः प्रेम के गीत होते हैं। इन गीतों में बारी-बारी से स्त्री-पुरुषों का दल एक दुसरे के सवालों का जवाब देता है। पहले समूह की कही गई अन्तिम लाईन को दुहराकर दूसरा समूह अपनी बात कहता है। इसके अलावा हर एक छोपती की अपनी एक टेक होती है, जिसे बार बार दुहराना पड़ता है। जो बदली नही जा सकती है।

पारम्परिक छोपती नृत्य गीत के बोल यहां देखें –

पोसतू का छुमा, मेरी भाग्यानी बौ !
आज की छोपती, मेरी भग्यानी बौ
रै तुमारा जुमा, मेरी भग्यानी बौ ।
भखोड़ का ढोका, मेरी भग्यानी बौ
रे तुमारा जुमा, मेरी भग्यानी बौ
हम अजाण लोका, मेरी भग्यानी बो !
बाजी त छुड़ीका, मेरी भग्यानी बौ,
इनू देण ढुवा, मेरी भग्यानी चौ,
हिंग सातुड़ीका, मेरी भग्यानी बौ ।
काखड़ की सींगी, मेरी भग्यानी बौ
रातू क सुपिना देखी, मेरी भग्यानी बौ,
दिन आंख्यों रींगी, मेरी भग्यानी बौ !
बान को हरील, मेरी भग्यानी बौ
रिंगदो रिंगदो, मेरी भग्यानी बौ,
त्वै मुग सरील, मेरी भग्यानी बौ ।

बदलको रूम, मेरी भग्यानी बौ
यनु मन को कुरोध, मेरी भग्यानी बौ,
जनु रेल धूम, मेरा भग्यानी यौ ।
वान की वराणी, मरी भग्यानी चौ.,
हँसी रण खेली, मेरी भग्यानी बौ,
द्वि दिन पराणी, मेरी भग्यानी बौ !
पैरी त सुलार, मेरी भग्यानी बौ !
द्वी दिन की ज्वानी, मेरी भग्यानी बौ !
ज्वानी का उलार, मेरी भग्यानी बौ!
दालो ध्वैती छ्वीलो, मेरी भग्यनी बौ,
तेरा बाना होइगे, मेरी भग्यानी बौ,
सरील को क्वीलो, मेरी भग्यानी बौ !
काटी गालो घास, मेरी भग्यानी बौ,
काम करी काज, मेरी भग्यानी बौ !
ज्यू तुमारा पास, मेरी भग्यानी बौ।
ग्वग्वाडी का तोडा, मेरी भग्यानी बौ
हूँसी रण खेली, मेरी भग्यानी बौ,
ज्वानी रैंगे थोडा, मेरी भग्यानी बौ !
बुल-चुली कौल, मेरी भग्यानी बौ,
सण खेलरण, मेरी भग्यानी वो
त्वे जीवन-जॉल, मेरी भग्यानी बौ !
बासुरी दनकी, मेरी भग्यानी बौ !
भरपूरय ज्वानी मेरी भग्यानी बौ !
नी होगी मन की, मेरी भग्यानी बौ!
गेऊ जौ का कीस, मेरी भग्यानी बौ!
तेरी मेरी माया, मेरी भग्वानी बौ!
उनु ठंड पाणी तीम, मेरी भग्यानी बौ !

काली गौ को चौर, मेरी भग्यानी बौ,
त्वै सरी गुलाबी फूल, मेरी भग्यानी बौ,
मैं सरीको भर, मेरी भग्यानी बौ !
तमाखू को गूल, मेरी भग्यानी वौ,
तू सुइण को धागो, मेरी भग्यानी वौ,
मु गुलाब को मेरी भग्यानी बौ ।
ढोल की लाकुडी, मेरी भग्यानी बौ,
तू येनी देखेन्दी, मेरी भग्यानी बौ !
हवारण सी काखुड़ी, मेरी भग्यानी बौ !
आणीबूणी मारणी, मेरी भग्यानो बौ !
एक मन बोद, मेरी भग्यानी बौ !
काखडी तोडी खाणी, मेरी भग्यानी बौ !
कोरी त कुनाली, मेरी भग्यानी बौ !
भौज तू देखेन्दी, मेरी भग्यानी बौ !
डॉडू-सी मुनाली, मेरी भग्यानी बौ !
अतर की डबी, मेरी भग्यानी बौ !

आज की छोपती, मेरी भग्यानी बौ !
सौती गाली कवी, मेरी भग्यानी बौ !
सौड़ पके बेर, मेरी भग्यानो बौ !
आज की छोपती, मेरी भग्यानी बौ !
बरसू को फेर, मेरी भग्यानी बौ।
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SOURCEगोविंद चातक जी की किताब " गढ़वाली लोकगीत "
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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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