भरतु दाई देहरादून का पहला गैंगस्टर कैसे बना? एक साधारण पहाड़ी छात्र से दून के डॉन बनने तक की पूरी कहानी पढ़ें – गैंगवार, शूटआउट, बैंक लूट और 14 नवंबर 1978 की आख़िरी घटना सहित।
आपने बिहार और झारखंड के खूनी गैंग-वार पर बनी फिल्म Gangs of Wasseypur देखी होगी. आपने बॉम्बे के अंडरवर्ल्ड के वो हिंसक किस्से सुने होंगे, जिन्हें सुनकर इस माया नगरी से प्यार नहीं, बल्कि डर लगने लगता था. आपने पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के कुख्यात हिस्ट्रीशीटर्स और गैंगस्टर्स की आपसी खूनी अदावतों की खबरें भी खूब पढ़ी होंगी. और सत्तर के दशक में आई हॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्म The Godfather के मुख्य किरदार कॉरलियॉनी को न्यू यॉर्क की गलियों में कोहराम मचाते भी देखा होगा,
लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसी दौर में जब देश-दुनिया के ये कुख्यात डॉन रिवाल्वर, बंदूक और खुखरियों से आतंक की सत्ता कायम किये हुए थे, तभी शांत-से दिखने वाले शहर Dehradun में मशीन गन और हैंड-ग्रेनेड लिए एक कुख्यात गैंगस्टर ने आतंक काटा हुआ था. अपने कारनामों के चलते इस गैंगस्टर की न केवल देहरादून शहर में तूती बोलने लगी थी, बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और मुंबई के बड़े-बड़े माफिया भी इस पहाड़ी बाहुबली का इस्तकबाल जरायम की दुनिया में कर रहे थे. उसने न केवल एक-एक कर अपने सभी दुश्मनों को ठिकाने लगा दिया था बल्कि देहरादून में रंगदारी, अपहरण और हत्याओं की पहली पहल पटकथाएँ भी लिखी.
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आज़ादी के बाद का देहरादून और अपराध की शुरुआत –
ये कहानी शुरू होती है उस दौर से जब देश को आज़ाद हुए महज़ एक दशक ही बीता था. बँटवारे का दंश झेल रहे लाखों परिवार अपनी बिखर चुकी ज़िंदगी को समेटने में खपे जा रहे थे. ऐसे ही कुछ परिवारों को देहरादून के प्रेमनगर और रेसकोर्स में भी बसाया गया. आमदनी के साधन सीमित थे तो इनकी अगली पीढ़ी के कई युवा जुर्म की दुनिया में आमद कराते चले गये. सट्टेबाज़ी, कच्ची शराब का धंधा, अवैध खनन, फिल्मों के टिकट ब्लैक करना, स्क्रैप की नीलामी उठाना और साइकल स्टैंड के ठेके हथियाने जैसे धंधे यहां के बेरोजगार नौजवानों की पहली पसंद बन रहे थे।
इन लड़कों ने जब अवैध धंधों से मिलने वाले पैसे का स्वाद चखा तो इनके कई गैंग पनपने लगे. ये लोग शहर में खुले आम रंगदारी, अपहरण और डकैती जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगे. पूरे शहर में इनका आतंक फैलने लगा और संगठित अपराधों से दून के हर इलाके में खौफ पसरने लगा था. कहा जाता है कि इन गैंग्स का सबसे बड़ा शिकार गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों से दून में आकर बसे पर्वतीय मूल के लोग हो रहे थे. इनका आतंक इतना गहरा था कि लूट हो जाने के बाद भी न तो कोई पुलिस रिपोर्ट दर्ज होती और न कोई उनके खिलाफ गवाही देने की हिम्मत करता.
डीएवी इंटर कॉलेज का छात्र और किस्मत का मोड़ –
इसी अफ़रा-तफ़री, आतंक और डर के बीच डीएवी इंटर कॉलेज में एक छात्र अपनी 12 वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटा था। उसके पिता मातबर सिंह एक काश्तकार थे जो कुछ साल पहले ही टिहरी जिले के दिखोल गांव से अपना पूरा परिवार लेकर, देहरादून के पूर्वी छोर पर बालावाला में आ बसे थे।
ये लड़का मातबर सिंह के तीन बेटों में सबसे बड़ा था और 12वीं के बाद फौज में भर्ती होने का सपना देख रहा था. लेकिन नियति को ये मंजूर नहीं था। क्लास में हुई एक मामूली कहा-सुनी ने इस लड़के के सारे सपने तोड़ दिए और इसे अपराध की दुनिया के ऐसे वन-वे पर चलने को मजबूर कर दिया जहां फिर कोई यू-टर्न नहीं था।
हुआ यूं कि इस लड़के की एक क्लासमेट को कोई मनचला लगातार परेशान कर रहा था. लड़की पहाड़ी थी और उसे तंग करने वाला प्रेमनगर के बदमाशों का करीबी समझा जाता था. लड़की की परेशानी देख पहाड़ी मूल के छात्रों में गुस्सा तो था लेकिन कोई भी इस मनचले से टकराने की हिम्मत नहीं कर रहा था। इस लड़के ने वो हिम्मत दिखाई और मनचले से दो टूक कह दिया कि वो इस लड़की को आज के बाद तंग न करे. ये झड़प हाथापाई में बदल गई और अगले ही दिन वो मनचला प्रेमनगर के अपने कुख्यात बदमाश साथियों को बुला लाया।
लाठी-डंडे लिए ये बदमाश जब स्कूल के बाहर पहुँचे तो ये लड़का इन्हें देख कर भागा नहीं, बल्कि अपनी बेल्ट लहराता हुआ इन बदमाशों पर झपट पड़ा। दो लड़कों को उसने अपनी बाहों के बीच दबाया और फिर इतने जोर से नीचे पटका कि एक का सिर और दूसरे का जबड़ा टूट गया. जमीन पर खून बिखरा देख बाक़ी सभी बदमाश भाग गए. ये पहली बार हुआ था जब किसी पहाड़ी लड़के ने प्रेमनगर के कुख्यात बदमाशों से टकराने की हिम्मत की थी. लड़ाई के बाद स्कूल के तमाम पहाड़ी लड़कों ने उसे अपने कंधों पर बैठा लिया और उसकी जय जयकार करने लगे।
“भरत सिंह नेगी” से “भरतु दाई ” (Bhartu dai ) बनने तक –
यही वो दिन था जब भरत सिंह नेगी नाम के इस लड़के को पहली बार भरतू दाई कहा गया; यही वो दिन था जहां से भरतू की आमद अब किसी फौजी बैरक के हाज़िरी रजिस्टर के बजाए, पुलिस के क्राइम रिकॉर्ड में दर्ज होने वाली थी और यही वो दिन था, जब देहरादून के एक भावी कुख्यात गैंगस्टर ने जन्म ले लिया था. उसने प्रेमनगर के उन कुख्यात बदमाशों से दुश्मनी मोल ले ली थी जिनसे पूरा शहर ख़ौफ़ खाता था. ये दुश्मनी फिर बढ़ती गई, भरतू भी इससे पार के लिए और हिंसक होता गया और उसका नाम देहरादून के अलग-अलग थानों में अपराध-दर-अपराध दर्ज होता चला गया।
भरतू भले ही पुलिस के क्राइम रिकॉर्ड में बतौर गैंगस्टर दर्ज हो रहा था लेकिन आम लोगों के बीच उसकी रॉबिनहुड जैसी छवि बन रही थी. गरीब, बेसहारा और शोषित लोगों की मदद करने के उसके कई क़िस्से चर्चित होने लगे थे।
कहते हैं कि अगर किसी गरीब पहाड़ी परिवार में बेटी की शादी हो तो भरतू वहां आर्थिक मदद जरूर दे आता था. किसी को इलाज के लिए पैसे चाहिए होते तो वो भरतू के पास आता. न जाने कितने बुजुर्ग लोगों की भरतू ने मदद की. उसे पहाड़ी जनता का बड़ा समर्थन मिलता था और इसका फायदा वो अपने दुश्मनों को रास्ते से हटाने में भी ले रहा था.
भरतू के पास अब तक नाइन एमएम की कारबाइन स्टेनगन भी आ चुकी थी. इससे भरतू का कद भी बहुत बढ़ गया था और उसका दुस्साहस भी. इसी दुस्साहस में भरतू ने एक बड़े हत्याकांड को अंजाम दिया. ऐसा हत्याकांड जिसकी गूंज उस वक्त दिल्ली के सफेदपोशों से लेकर मुंबई के अंडरवर्ल्ड तक पहुंच गई.
हुआ यूं कि भरतू किसी भी तरह बारू को मारने की फिराक में था. एक रोज़ उसके मुखबिरों ने उसे बताया कि बारू अपनी बुलेट पर सवार होकर जोगीवाला की तरफ आ रहा है. बारू की पहचान बन चुकी काली चमड़े की जैकेट और बुलेट मोटरसाइकिल को सामने से आता देख भरतू ने अपनी मशीनगन की पूरी मैगजीन उस बाइक सवार के सीने में उतार दी. लेकिन बाद में मालूम चला कि वो बारू नहीं बल्कि उसकी ही गैंग में काम करने वाला विजयंत था। विजयंत की वहीं मौत हो गई लेकिन इससे अब बारू बेहद सतर्क हो गया।
उधर, दिनदहाड़े मशीनगन से हुए इस हत्याकांड से क़ानून व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए थे. पुलिस पर भारी दबाव आने लगा लिहाजा पुलिस ने दोनों ही गैंग के सदस्यों का सीधा एनकाउंटर करना शुरू किया। भरतू के गैंग में शामिल जेबकतरों का सरदार काड़ू, विजय उर्फ गोजू और भरतू के बेहद ख़ास आनंद को ऐसे ही एक एनकाउंटर में पुलिस अधिकारी नरेंद्र सिंह और उनकी टीम ने मार गिराया। यही वो दौर भी था जब में इमरजेंसी लगी थी। भरतू को पुलिस ने मीसा यानी Maintenance of Internal Security Act के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
मुजफरनगर में एक बड़ी बैंक लूट भरतु दाई का सहयोग –
अपने कुछ बेहद ख़ास साथियों के मारे जाने से भरतू बेचैन था और जेल से बाहर आने को छटपटा रहा था. तभी एक ऐसी घटना हुई, जिसके चलते वो पुलिस की गुड बुक में आ गया. हुआ ये था कि मुजफरनगर में एक बड़ी बैंक लूट हो गई. ये बैंक लूट आठ लाख रूपये की थी और सत्तर के दशक में ये देश की बड़ी बैंक लूट में से एक थी। इसे इतने शातिराना तरीके से अंजाम दिया गया था कि पुलिस के हाथ काफी समय तक खाली रहे।
उस समय देहरादून कोतवाली में इंस्पेक्टर महावीर त्यागी थे। उन्हें इस बात का इल्म था कि भरतू के पश्चिम यूपी के बड़े कुख्यात बदमाशों से संबंध हैं. लिहाज़ा वो जेल में भरतू के पास गए और उससे मदद करने को कहा. भरतू ने इसे एक मौके की तरह लिया और जो जानकारी पुलिस इंस्पेक्टर को दी, उससे उनके ही पैरों तले जमीन खिसक गई।
भरतू ने बताया कि ये लूट विक्रम और धर्मपाल नाम के दो जाटों ने उसकी ही मशीनगन का इस्तेमाल करते हुए की है। उसने ये भी बताया कि वो दोनों अब चंडीगढ़ में छुपे हुए हैं। भरतू की मदद से पुलिस ने दोनों को दबोच लिया. लेकिन इस ऑपरेशन में इंस्पेक्टर महावीर त्यागी की मौत हो गई। आगे चलकर विक्रम और धर्मपाल नाम के इन बदमाशों को फांसी की सजा हुई।
बारू और भरतु का संघर्ष –
बहरहाल ये गिरफ़्तारी पुलिस की बड़ी जीत थी और इसमें भरतू ने अहम किरदार निभाया था. लिहाज़ा उसे पुलिस से परोक्ष समर्थन मिलना और भी बढ़ गया था. लेकिन अब तक बारू से उसकी दुश्मनी बेहद बढ़ चुकी थी और बारू भी अब कोई छोटा-मोटा गैंगस्टर नहीं रह गया था. उसके गैंग में भी मशीनगन से लेकर वो तमाम हथियार आ चुके थे जो भरतू की गैंग के पास हुआ करते थे। इससे दून घाटी में खूनी तांडव इतना बड़ गया कि लोग शाम को घर से निकलने में भी डरने लगे थे।
आए दिन हत्या होना आम बात हो गई थी. रायपुर में भरतू गैंग का कुंदन मारा गया तो बदले में भरतू ने बारू के साले तेजू और उसके साथी रामअवतार को प्रिंस चौक के पास मार गिराया. इसी दौरान पुलिस ने बारू के एक खास आदमी को अपनी तरफ मिला लिया और एक दिन उसी खास आदमी ने बारू की शराब में जहर मिलाकर उसकी हत्या कर दी. कहा जाता है कि इस पूरी साजिश में भरतू का भी अहम किरदार था।
14 नवंबर 1978 – भरतू दाई का आख़िरी दिन –
भरतू का सबसे बड़ा दुश्मन अब मार चुका था। हालाँकि बारू की मौत के बाद उसका गैंग शशि और रेशम थापा संभाल रहे थे लेकिन भरतू इन्हें अपना लिए कोई खतरा नहीं मानता था। उसका यही अति का आत्मविश्वास उसकी मौत का कारण भी बना।
तारीख थी 14 नवंबर 1978. बालावाला में एक नाटक समारोह आयोजित होने वाला था। भरतू को ऐसे समारोह बेहद पसंद थे। भरतू इसकी तैयारी में जमकर लगा हुआ था और इसी सिलसिले में वो अपने साथी राजेंद्र सिंह के साथ नाटक के निमंत्रण पत्र छपवाने एस्ले-हॉल की एक प्रिंटिंग प्रेस अपनी मोटरसाइकिल से जा रहा था।
रास्ते में भरतू अपने एक परिचित के पास रुका और उसे बताया कि उसकी मशीनगन का बर्स्ट फायर तीन गोली दागने के बाद अटक रहा है. उसने अपनी मशीनगन मरम्मत के लिए इस परिचित के पास ही छोड़ दी और अपनी बुलेट से एस्ले-हॉल की तरफ निकल गया। परिचित ने उसे चेताया भी वो बिना हथियार के ऐसे खुलेआम शहर न जाए. भरतू ने जवाब दिया, ‘अब कौन बचा है जो मेरी जान ले सके”।
लापरवाही में कहा गया वाक्य भरतू के जीवन का अंतिम वाक्य साबित हुआ। रेशम, शशि और उनके तीसरे साथी मजनू को जब ये सूचना मिली कि भरतू बिना हथियार के निकला है तो जैसे उनकी मुराद पूरी हो गई। मजनू के पास ऑटो था। तीनों हथियारों से लैस होकर ऑटो में बैठे और भरतू के पीछे निकल गए।
उस दिन भरतू के साथ रहे राजेंद्र सिंह बताते हैं, ‘ एक ऑटो आया और हमारी बाइक के बगल में चलने लगा. उस पर पर्दे लगे हुए थे। फिर एक पर्दा हटा और मशीनगन से जबरदस्त बर्स्ट फायर हुआ. एक गोली मेरे जबड़े में लगी जबकि तीन सीने में ,मैं बेहोश हो गया। तकरीबन दस गोली भरतू को लगी और उसकी वहीं मौत हो गई. मैं किसी तरह बच गया और लंबे समय अस्पताल में रहे के बाद ठीक हुआ।
बताते हैं कि जिस दिन भरतू मारा गया उस दिन बालावाला समेत कई गांवों में लोगों ने दुख में चूल्हा नहीं जलाया था। भरतू की मौत के साथ ही देहरादून में संगठित अपराधों के शुरुआती अध्याय का भी अंत हो गया। लेकिन, उसकी दादागिरी के किस्से और रॉबिनहुड सरीखी कहानियां दशकों तक देहरादून में सुनाई जाती रही। बालावाला में उसके नाम से एक चौक आज भी मौजूद है।
निष्कर्ष: देहरादून के पहले डॉन की विरासत
भरतू की मौत के साथ ही देहरादून में संगठित अपराधों के शुरुआती अध्याय का भी अंत हो गया। लेकिन, उसकी दादागिरी के किस्से और रॉबिनहुड सरीखी कहानियां दशकों तक देहरादून में सुनाई जाती रही। बालावाला में उसके नाम से एक चौक आज भी मौजूद है।
भरतू की हत्या के बाद रेशम और उसके दोनों साथियों का वर्चस्व भी दून में ज्यादा दिन न रह सका। क्योंकि जल्द ही दून घाटी में एक नए दाई का उदय हुआ जिसने घाटी में अपराधों में दूसरा अध्याय शुरू किया। रेशम थापा और शशि की हत्या करके अपना वर्चस्व जमाने वाले इस नए कुख्यात का नाम था निक्कू।
पोस्ट साभार फेसबुक और पब्लिक डोमेन पर उपलब्ध जानकारियां।
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