आदिबदरी धाम का प्रसिद्ध नौठा कौथिग मेला, जिसे उत्तराखंड का लठमार मेला कहा जाता है। जानिए इसका इतिहास, परंपरा और युद्ध से उत्सव बनने की पूरी कहानी।
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प्रस्तावना
उत्तराखंड की पवित्र भूमि में स्थित आदिबदरी धाम भगवान नारायण की तपस्थली रही है। यह वही स्थान है जहां प्राचीन समय में ऋषि-मुनियों ने साधना कर आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत किया। पुरातनकाल में इस स्थान को नारायण मठ के नाम से जाना जाता था, जो इसकी धार्मिक महत्ता को और अधिक प्रमाणित करता है।
हरिद्वार से लगभग 213 किलोमीटर की दूरी पर, प्राचीन चांदपुरगढ़ के निकट स्थित आदिबदरी आज भी श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए एक विशेष आकर्षण बना हुआ है।
मंदिर समूह और स्थापत्य विशेषता-
आदिबदरी सोलह मंदिरों का एक विशाल धाम था, किंतु वर्तमान समय में यहां पर केवल चौदह मंदिर ही अच्छी अवस्था में मौजूद हैं। इन चौदह मंदिरों के समूह में मुख्य मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।
इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की काले पाषाण से निर्मित लगभग तीन फीट ऊंची प्रतिमा खड़ी मुद्रा में स्थापित है। यह प्रतिमा अपनी सादगी और दिव्यता के कारण श्रद्धालुओं के मन में गहरी आस्था उत्पन्न करती है।
नौठा कौथिग: प्राचीन परंपरा का मेला
आदिबदरी धाम में हर वर्ष नौठा कौथिग के नाम से प्रसिद्ध मेला आयोजित होता है। इसे उत्तराखंड का प्रसिद्ध लठमार मेला भी कहते हैं। यह मेला वैशाख के पांचवें सोमवार या ज्येष्ठ के प्रथम सोमवार को लगता है। इस मेले का प्रारंभ कब हुआ, इसका कोई सटीक प्रमाण नहीं है, लेकिन लोकमान्यता के अनुसार यह मेला उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं आदिबदरी मंदिर समूह।
मेले का मुख्य केंद्र आदिबदरी का प्रांगण होता है, जहां आसपास के गांव—जैसे खेती, बूंगा, बुराखुली आदि—अपने-अपने अधिकार का दावा करते रहे हैं।
अधिकार और प्रतिष्ठा का संघर्ष-
इस क्षेत्र के प्रसिद्ध ठाकुरों ने आदिबदरी को अपना विशेष तीर्थ घोषित किया और वर्ष में एक बार यहां पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू की। धीरे-धीरे मंदिर में प्रथम पूजा करने की परंपरा प्रतिष्ठा का विषय बन गई। हर गांव के लोग चाहते थे कि उन्हें पहले पूजा करने का अवसर मिले।
इसी प्रतिस्पर्धा ने संघर्ष का रूप ले लिया। लोग गांवों से जत्था बनाकर आते और पहले पूजा करने का श्रेय पाने के लिए दूसरे गांवों के लोगों से भिड़ जाते।
उनके हाथों में—बरछे,लाठियां ,भाले जैसे हथियार होते थे। निर्धारित तिथि पर सभी मंदिर परिसर में एकत्र होते और टकराव होने पर यह स्थिति कई बार खूनी संघर्ष में बदल जाती।
जब प्रांगण बना युद्धभूमि-
लोकश्रुति के अनुसार, उस समय आदिबदरी का मंदिर प्रांगण एक युद्धभूमि में परिवर्तित हो जाता था। इस संघर्ष में कई लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती थी। समय के साथ लोग इस हिंसा से बचने के लिए अपने साथ लोहे के तसले लाने लगे, जिन्हें वे ढाल के रूप में उपयोग करते थे।
संघर्ष से उत्सव तक का परिवर्तन –
कालांतर में धीरे-धीरे इस संघर्ष ने मेले का रूप ले लिया। लोगों ने आपसी द्वेष को त्यागकर भाईचारे और सौहार्द की भावना को अपनाया। आज यह मेला एक सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है, जहां लोग मिलकर अपनी परंपरा का उत्सव मनाते हैं।
प्रतीकात्मक युद्ध की झलक –
आज भी पुराने समय की याद में लोग हाथों में लाठियां लेकर मेले में पहुंचते हैं, लेकिन अब उनके दूसरे हाथ में रंग-बिरंगे रूमाल बंधे होते हैं। प्रतीकात्मक युद्ध के रूप में लाठियां केवल हवा में पटकी जाती हैं, जिससे यह परंपरा जीवित भी रहती है और किसी प्रकार की हिंसा भी नहीं होती।
मेले का जीवंत वातावरण –
मेले के दिन सुबह-सुबह ही दूर-दूर के गांवों से लोग ढोल-दमाऊं की थाप पर आदिबदरी की ओर बढ़ते हैं। महिलाएं “नौठा कौथिग कुभामेर” गीत गाते हुए आती हैं और पुरुष नाचते-गाते हुए पहाड़ियों से नीचे उतरते हैं।
इस दौरान एक विशेष परंपरा निभाई जाती है—
एक व्यक्ति झुकता है, फिर उसके साथ अन्य लोग भी क्रमशः झुकते हैं और अचानक खड़े होकर जोर से बोलते हैं:
“हुर्र हुल्ला! हुर्र हुल्ला!” यह आवाज दूर-दूर तक गूंजती है और पूरा वातावरण ऊर्जा से भर जाता है।
कुभामेर की कथा –
नौठा कौथिग मेले में गाए जाने वाले गीतों में “कुभामेर” का उल्लेख मिलता है, जिसे एक तिब्बती डाकू माना जाता है। यह प्रसंग इस मेले को केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वीरता से जुड़ी लोकगाथाओं का भी प्रतीक बनाता है।
बैसाखी से शुरू होती तैयारियां –
नौठा कौथिग मेले की तैयारी आसपास के गांवों में बैसाखी से ही शुरू हो जाती है। लोग समूह बनाकर यात्रा की योजना बनाते हैं, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की तैयारी करते हैं और इस उत्सव को पूरे उत्साह के साथ मनाने के लिए तैयार होते हैं।
आज का महत्व –
आज आदिबदरी धाम और नौठा कौथिग मेला—
- आस्था का केंद्र है।
- सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
- और सामाजिक एकता का संदेश देता है।
जहां कभी संघर्ष होता था, आज वहां प्रेम और भाईचारे का उत्सव मनाया जाता है।
निष्कर्ष –
आदिबदरी धाम और उसका नौठा कौथिग मेला हमें यह सिखाता है कि समय के साथ परंपराएं बदल सकती है।
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