देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों से शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो भविष्य की पीढ़ी के लिए चिंताजनक है। राज्य के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में नेतृत्व का भारी अभाव है। आलम यह है कि प्रदेश के लगभग 93 प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक के पद खाली पड़े हैं, जिससे प्रशासनिक और शैक्षणिक ढांचा चरमरा गया है।
आंकड़ों में खाली पदों की हकीकत
राज्य के शिक्षा विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, हाईस्कूलों में करीब 850 प्रधानाध्यापक और इंटर कॉलेजों में 1210 प्रधानाचार्य के पद रिक्त हैं। यानी हजारों छात्र बिना किसी स्थायी प्रशासनिक प्रमुख के अपनी शिक्षा पूरी करने को मजबूर हैं। स्थायी नेतृत्व न होने के कारण न तो स्कूलों में अनुशासन सही ढंग से लागू हो पा रहा है और न ही सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो रहा है।
परीक्षा बनाम पदोन्नति: टकराव का केंद्र
पदों को भरने के लिए सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए 50 प्रतिशत पदों को सीमित विभागीय परीक्षा के माध्यम से भरने का निर्णय लिया था। इसके लिए राज्य लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भी भेजा गया, लेकिन शिक्षक संगठनों के कड़े विरोध के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े।
- शिक्षकों का तर्क: शिक्षक संगठनों का मानना है कि इन पदों को केवल वरिष्ठता और पदोन्नति (Promotion) के आधार पर भरा जाना चाहिए।
- सरकार का पक्ष: सरकार का तर्क है कि विभागीय परीक्षा से चयन होने पर गुणवत्ता में सुधार होगा और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
वर्तमान में यह विवाद सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है, और भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से ठप पड़ी है।
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तदर्थ शिक्षकों पर भी संकट के बादल
स्कूलों में केवल नेतृत्व ही नहीं, बल्कि शिक्षकों के विनियमितीकरण (Regularization) को लेकर भी पेच फंसा है। प्रदेश के 133 अशासकीय विद्यालयों में कार्यरत 413 तदर्थ शिक्षक मौलिक नियुक्ति के लिए अपात्र पाए गए हैं। विभाग के अनुसार, कटऑफ तिथि के बाद नियुक्त होने के कारण ये शिक्षक स्थायीकरण के दायरे में नहीं आ रहे हैं, जिससे उनकी नौकरी पर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा असर
नियमों और कानूनी दांव-पेंच के बीच सबसे बड़ा नुकसान छात्रों का हो रहा है। बिना स्थायी प्रधानाचार्य के स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता गिर रही है। जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक स्कूलों में नेतृत्व का यह खालीपन बना रहेगा। अब देखना यह होगा कि न्यायालय का निर्णय शिक्षकों की पदोन्नति के पक्ष में आता है या सरकार की परीक्षा वाली नीति पर मुहर लगाता है।
