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“हवीक या हबीक” उत्तराखंड कुमाऊं में पितृ पक्ष पर निभाई जाने वाली ख़ास परम्परा

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हवीक
हवीक का अर्थ

हवीक : भाद्रपद और अश्विन माह में पितृपक्ष पर समस्त सनातनियों की तरह उत्तराखंड वासी भी, बड़ी श्रद्धा और खुशी से अपने पूज्य पूर्वजों को तर्पण देते हैं। उनका श्राद्ध करते हैं, श्राद्ध का अर्थ होता है, जो श्रद्धा से दिया जाय। मूल सनातन धर्म के पितृ पक्ष को या अन्य रिवाजों को प्रत्येक राज्य और प्रत्येक संस्कृति में इनकी परम्पराओं में थोड़ा अंतर होता है। इसी प्रकार उत्तराखंड के कुमाउनी समाज में भी पितृ पक्ष पर,कुछ खास रिवाज होते हैं। इन खास रिवाजों में से एक रिवाज है, हवीक या हबीक रखना।

क्या है कुमाऊं की हबीक या हवीक परम्परा –

कुमाऊं में पितृपक्ष पर अपने पितरों के श्राद्ध के पहले दिन श्राद्ध करने वाला, उपवास लेता है। सूर्यास्त से पहले एक बार भोजन किया जाता है। भोजन से पहले गाय और कौवो  को भोज्य पदार्थ दिया जाता है। पहले दिन व्रत रखने का उद्देश्य यह रहता है ,कि श्राद्ध के दिन अपने पूर्वजों को शुद्ध मन पिंड तर्पण किया जा सके।

कुमाऊं के कुछ भागों में इसे ‘एकबख्ता’ भी कहते हैं। कई जगह  इस दिन कढ़ी-चावल (झोई भात) बनाई जाती है। दूसरे दिन श्राद्ध के दिन मौसमी फल, पूरी सब्जी खीर ,कढ़ी चावल आदि भोज्य पदार्थों के साथ कुल पुरोहित की उपस्थिति में ,अपने पूर्वजों को पिंडदान किया जाता है। अब बात करते है हबीक का अर्थ ,या हवीक के अर्थ के बारे में। कुमाऊं में कहीं -कहीं इसे हबीक कहते हैं ,कही हवीक।

कही कही हबीक  शब्द  का प्रयोग किया जाता है। वैसे यह शब्द कुमाउनी समाज में कब आया और क्यों आया और कैसे आया  इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

इसका प्रयोग पितरों की पुण्यतिथियों के सम्बन्ध में अनुष्ठित किये जाने वाले श्राद्ध की आनुष्ठानिक परम्परा के सन्दर्भ में किया जाता है। इसके अंतर्गत श्राद्ध की तिथि के नियतपूर्व श्राद्धकर्ता को क्षौरकर्म करवाना होता है। दिन भर निराहार रहकर ,दिन में सूर्यास्त से पूर्व एक बार भोजन करता है। 

हवीक का शाब्दिक होता है , हवि +इक  हवि का अर्थ होता है ,आहुति देना। और इक का मतलब है एक बार। इस प्रकार हवीक शब्द का अर्थ हुवा एक आहुति देना। अर्थात अपने पूर्वजों को शुद्ध अंतःकरण से पिंडदान करने के लिए , एक दिन पूर्व अपनी भूख की हवि देना या अपनी जठराग्नि को एक ही आहुति देना।

हवीक का अर्थ –

प्रसिद्ध भाषाविद लेखक श्री सुरेश पंत जी ने कुछ इस प्रकार हवीक या एकबखत का अर्थ बताया है, एकाबखत “एक+अभुक्त” से है। सात्त्विकता के लिए एक बार अभुक्त (बिना भोजन) रहकर शाम को भोजन का विधान है। भोजन कैसा? हबीख – हविष्य, अर्थात् यज्ञ में आहुति देने योग्य पवित्र। हविष्य घी या घी में बने हुए भोजन को भी कहा जाता है। नीति कहती है-

“निरामिषं हविष्यं वा सकृद्भुञ्जीत नान्यथा॥”
अर्थात :निरामिष या हविष्य भोजन एक बार किया जाय।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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