उत्तराखंड में हर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़ा उत्सव होता है। यहां मनाए जाने वाले पर्व-त्योहार न केवल ऋतु परिवर्तन के संकेतक हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों और सामाजिक एकता के प्रतीक भी हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति 2026 भी ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण पर्व है, जिसे राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ बड़े उल्लास से मनाया जाता है।
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मकर संक्रांति का खगोलीय और धार्मिक महत्व –
पौष मास के समाप्त होने और माघ मास की संक्रांति के दिन भगवान सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है, इसलिए इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं, यानी सूर्य उत्तर दिशा की ओर गमन करते हैं। इस कारण उत्तराखंड में इस पर्व को उत्तरैणी / उतरैणी भी कहा जाता है। इस परिवर्तन के साथ ही दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जिसे शुभ और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
उत्तराखंड में मकर संक्रांति के विभिन्न नाम –
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। राज्य के अलग-अलग अंचलों में मकर संक्रांति अलग-अलग नामों और रूपों में मनाई जाती है, जैसे—
- घुघुतिया / घुघुतिया त्यौहार
- पुस्यौडिया / पुषूडिया त्यार
- मकरैण / मकरैंण / मकरैणी
- उत्तरैणी / उतरौण
- खिचड़ी / खिचड़ी संक्रांति
- चुन्या त्यार
- मरोज पर्व (जौनसार-बावर क्षेत्र)
इन सभी नामों के पीछे स्थानीय परंपराएं, लोकविश्वास और जीवनशैली जुड़ी हुई है।
कुमाऊँ में मकर संक्रांति 2026 : घुघुतिया और पुस्यौडिया
कुमाऊँ मंडल में मकर संक्रांति को मुख्यतः घुघुतिया या पुस्यौडिया कहा जाता है।
अल्मोड़ा जनपद और सरयू नदी के पर्वतीय भाग में इस पर्व का आयोजन पौष मास की अंतिम तिथि को किया जाता है। इसी कारण इसे पुस्यौडिया (पौषमासिक) त्यौहार कहा जाता है। वहीं, सरयू नदी के इस पार के अधिकांश कुमाऊँ क्षेत्र में इसे प्रथम माघ, यानी मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है।
घुघुतिया पर्व की परंपरा –
इस दिन घरों में आटे, गुड़ और घी से बने घुघुते तैयार किए जाते हैं। बच्चों के गले में घुघुतों की माला पहनाई जाती है और वे कौओं को घुघुते खिलाते हुए गीत गाते हैं—
“काले कवा, काले
घुघुती माला खाले…”
यह परंपरा प्रकृति, पक्षियों और मानव के आपसी संबंध का सुंदर प्रतीक है।
गढ़वाल में मकर संक्रांति : उत्तरायणी और खिचड़ी संग्रात –
गढ़वाल क्षेत्र में मकर संक्रांति को उत्तरायणी, मकरैंण या खिचड़ी संग्रात के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन स्नान-दान, सूर्य पूजा और खिचड़ी बनाने की परंपरा है। खिचड़ी को सामूहिक रूप से बांटना सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है।
जोशीमठ क्षेत्र की विशेष परंपरा : चुन्या त्यौहार-
जोशीमठ क्षेत्र के 50 से अधिक गांवों में मकर संक्रांति से दो-तीन दिन पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
सात प्रकार के अनाज—दाल, चावल, झंगोरा आदि—की सामूहिक कुटाई-पिसाई की जाती है, जो स्वयं में एक लोक उत्सव जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है।
चुन्या पकवान और लोक कला-
मकर संक्रांति के दिन गुड़ के घोल से चुन्या नामक विशेष पकवान बनाया जाता है।
सात अनाजों के घोल से घर की दीवारों पर भगवान सूर्यदेव और उनके दल-बल का प्रतीकात्मक चित्र अंकित किया जाता है, जो कुमाऊँ की ऐपण कला से मिलती-जुलती लोक अभिव्यक्ति है।
पूजा के बाद चुन्या प्रसाद ध्याणियों और पड़ोसियों में कल्यो के रूप में बांटा जाता है। इसी दिन खिचड़ी, गुलगुले और अरसे भी बनाए जाते हैं।
अगले दिन बच्चे कौओं को चुन्या खिलाते हुए गाते हैं—
“लै कावा चुन्या!
मीके दे सुनु पुन्या”
जौनसार-बावर और जौनपुर क्षेत्र : मरोज पर्व
उत्तराखंड के जौनसार-बावर और जौनपुर क्षेत्र में मकर संक्रांति को मरोज पर्व के रूप में मनाया जाता है।
यह पर्व पौष मास की 28वीं तिथि से शुरू होकर माघ मास के अंत तक चलता है।
मरोज पर्व की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि जहां माघ माह को सामान्यतः व्रत-सात्विक आहार का महीना माना जाता है, वहीं इस क्षेत्र में पूरे माघ महीने मांस और मदिरा का सेवन, नाच-गाना और मेहमाननवाजी की परंपरा निभाई जाती है। यह लोकजीवन की स्वतंत्र और जीवंत सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
उत्तराखंड में मकर संक्रांति 2026 का सांस्कृतिक संदेश
मकर संक्रांति केवल सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व नहीं है, बल्कि यह—
ऋतु परिवर्तन का संकेत प्रकृति के साथ सामंजस्य लोक परंपराओं की निरंतरता सामाजिक एकता और सहभागिता का उत्सव है उत्तराखंड में मकर संक्रांति 2026 को घुघुतिया त्यौहार, पुषूडिया त्यार, उत्तरैणी, खिचड़ी संग्रात और मरोज पर्व जैसे विविध नामों से मनाया जाना यह दर्शाता है कि एक ही पर्व किस तरह अलग-अलग सांस्कृतिक रंगों में ढलकर देवभूमि की पहचान बन जाता है।
घुघुतिया त्यौहार | इतिहास, लोककथा और रीत-रिवाज | Ghughutiya Festival 2026
