Friday, April 4, 2025
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उफराई देवी मंदिर: आस्था, उत्सव और हिमालयी विरासत।

उफराई देवी मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में नौटी गांव में स्थित एक प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थल है। यह मंदिर समुद्र तल से 5300 फीट की ऊंचाई पर बसा है और उफराई देवी को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग भूम्याल देवी के रूप में पूजते हैं। यह स्थान अपनी धार्मिक महत्ता, पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम उफराई देवी मंदिर के इतिहास, उससे जुड़ी कथा, वार्षिक उत्सव और यात्रा के बारे में विस्तार से जानेंगे। यदि आप उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

उफराई देवी की पौराणिक कथा –

उफराई देवी की कहानी एक रोचक स्थानीय जनश्रुति पर आधारित है, जो 7वीं या 8वीं शताब्दी से जुड़ी बताई जाती है। राकेश मोहन भण्डारी, श्रीनगर के अनुसार, एक बार वैनोली गांव की कुछ महिलाएं घास काटने के लिए नौटी की उत्तर दिशा में स्थित एक चोटी पर गईं। उनके साथ आलमसिंह की एक लड़की भी थी, जो अचानक गायब हो गई। महिलाओं ने उसे बहुत ढूंढा, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। बाद में, उन्होंने चोटी पर उसकी जूरी-दाथुली (रस्सी और दराती ) पड़ी हुई देखी। हारकर वे गांव लौट आईं और घटना की सूचना दी। गांव वालों ने दो दिनों तक खोजबीन की, लेकिन लड़की नहीं मिली।

फिर एक रात, वह लड़की नौटी गांव के मुखिया के स्वप्न में प्रकट हुई और बोली, “मैं नौटी, मैठाणा, नैणी, झुरकण्डे, नैनोली, और छतोली गांवों की देवी भूम्यां हो गई हूं। मेरा नाम उफराई देवी है, और जिस चोटी पर मैं अदृश्य हुई, वह उफराई ढांक कहलाएगी। तुम मेरी मूर्ति बनाकर ग्राम मंदिर में स्थापित करो और 12 माह मेरी पूजा करो। मेरे स्वामी शिवजी चोटी पर शिला रूप में विराजमान हैं। धान बोने से पहले एक पाथा (22 किग्रा.) अलग रखना और गेहूं की फसल की तैयारी पर उमी (कच्चे भुने हुए गेहूं की बालियां) तैयार करना। हर जेठ माह में मुझे चोटी पर ले जाकर पूजा करो और फिर वापस गांव लाना।”

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इस स्वप्न के आधार पर, गांव वालों ने उफराई देवी की मूर्ति बनाई और मंदिर में स्थापित की। तब से उनकी पूजा की परंपरा चली आ रही है, जिसे विजौण कहते हैं। हर 12 वर्ष में एक बड़ी पूजा, जिसे मौडिवी कहा जाता है, भी आयोजित होती है।

 उफराई देवी मंदिर का स्थान और महत्व –

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उफराई देवी मंदिर नौटी गांव में स्थित है, जो कर्णप्रयाग से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यह मंदिर 5300 फीट की ऊंचाई पर बसा है और हिमालय की मनोरम वादियों से घिरा हुआ है। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और शांति के लिए भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।

उफराई देवी को भूम्याल देवी के रूप में पूजा जाता है, और उनकी पूजा में फसलों से जुड़े अनुष्ठान विशेष रूप से शामिल होते हैं। यह मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र है और साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

 श्री उफरांई देवी मौडवी महोत्सव –

श्री उफरांई देवी मौडवी महोत्सव एक भव्य धार्मिक आयोजन है, जो हर 12 वर्ष में नौटी गांव में होता है। यह उत्सव हिमालयी सचल महाकुम्भ श्री नंदादेवी राजजात से एक वर्ष पहले आयोजित किया जाता है और इसे प्रथम अनुष्ठान या मनौती के रूप में भी जाना जाता है।

इस महोत्सव में उफराई देवी की चांदी की मूर्ति को श्रृंगार के साथ डोली में सजाया जाता है। गाजे-बाजे, भंगोर, चंवर और चांदी की छड़ के साथ भव्य यात्रा उफराई ढांक तक निकाली जाती है। उफराई ढांक नौटी से 5 किलोमीटर दूर, 8500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां एक पौराणिक पत्थर का मंदिर है। यात्रा के दौरान रास्ते में पत्थर की पढालों पर वृहद् भोग प्रसाद वितरित किया जाता है। उफराई ढांक में दो दिनों तक विशेष पूजा होती है, और दूसरे दिन धियाड़ियों को सुफल देने की परंपरा निभाई जाती है।

उफराई देवी की पूजा और अनुष्ठान –

उफराई देवी की पूजा में फसलों से जुड़े अनुष्ठान प्रमुख हैं। धान बोने से पहले 22 किलोग्राम धान अलग रखा जाता है, और गेहूं की फसल की तैयारी पर उमी तैयार की जाती है। हर जेठ माह में देवी की मूर्ति को चोटी पर ले जाकर पूजा की जाती है।

मौडिवी महोत्सव के दौरान, बैनोली की महिलाएं प्रसाद बनाती हैं, और गांव वाले अपनी ध्याण (बहन) को नौटी ले जाते हैं। देर रात तक मंदिर में झूमेला (पारंपरिक नृत्य) के साथ उत्सव मनाया जाता है, और देवी से कुशलता की मनौती मांगी जाती है। उफराई ठांक के मंदिर में भात और चैसे (गढ़वाली व्यंजन) का भोग लगाया जाता है। मंदिर से नीचे समतल मैदान पर सेरुल ब्राह्मण भक्तों को भात और काली दाल का प्रसाद परोसते हैं, जिसे सभी बड़े चाव से ग्रहण करते हैं।

अंतिम शब्द –

उफराई देवी मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ऐसा पवित्र स्थल है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक दृष्टि से अनूठा है। उफराई देवी की पौराणिक कथा, मंदिर का हिमालयी परिवेश और मौडवी महोत्सव की भव्यता इसे खास बनाती है। यदि आप आध्यात्मिक शांति और उत्तराखंड की समृद्ध परंपराओं का अनुभव करना चाहते हैं, तो उफराई देवी मंदिर की यात्रा अवश्य करें। यह स्थान आपकी आत्मा को सुकून और मन को नई ऊर्जा देगा।

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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