Friday, April 4, 2025
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उदयपुर गोलू देवता मंदिर , तुरंत न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं उदयपुर के गोलू देवता

चंद राजाओ के बसाये कैड़ारो में स्थित एक ऊँचे पर्वत पर है गोलू देवता का चमत्कारी मंदिर उदयपुर गोलू देवता मंदिर। यहाँ गोल्ज्यू अपने दरबार में भक्तों के कष्ट हरते हैं ,और उन्हें सन्मार्ग की प्रेरणा देते हैं। कहते हैं भगवान् गोलू देवता यहाँ निसंतान दम्पतियों को संतान सुख भी देते हैं।

उदयपुर गोलू देवता मंदिर –

उदयपुर गोलू देवता मंदिर कैड़ारौ घाटी में स्थित एक उदयपुर नामक पर्वत पर स्थित है। द्वाराहाट सोमेश्वर मार्ग पर स्थित बिन्ता नामक गांव से लगभग 5 किलोमीटर की थका देने वाली चढ़ाई चढ़ने के बाद आता है भगवान् गोलू देवता का चमत्कारी मंदिर जिसे उदयपुर गोलू देवता मंदिर के नाम से जाना जाता है। और भगवान् गोल्ज्यू के दिव्य दर्शनों के बाद और वहा की रमणीय सुंदरता पांच किलोमीटर की चढ़ाई को भुला देते हैं। यहाँ के प्राकृतिक नज़ारे आपका मनमोह लेंंगे।

उदयपुर गोलू देवता मंदिर
उदयपुर गोलू देवता मंदिर

बलि प्रथा पर क्या थे गोल्ज्यू के विचार –

कहते हैं यहाँ स्वयं गोलू देवता अवतरित होकर लोगो को न्याय देते हैं। उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं। यहाँ शीतकाल की नवरात्रियों में मेला लगता है। मनोकामना पूर्ण होने के बाद लोग अपनी मनौतियों के अनुसार भेंट चढ़ाते हैं। पहले यहाँ बलि प्रथा भी थी ,लेकिन 2006 -07 में बलि प्रथा पर उत्तराखंड हाईकोर्ट की रोक के बाद यहाँ बलि प्रथा बंद हो गई है।

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जिस साल बलि प्रथा बंद हुई उस साल हम भी गोल्ज्यू के दर्शनों के लिए नवरात्री मेले में उदयपुर के गोलु देवता मंदिर गए थे। वहां जब गोलू देवता ने अपने दर्शन दिए ,और भक्तों ने अपनी समस्याएं गोल्ज्यू के सामने रखी ,और गोल्ज्यू ने उनके समाधान दिए। उस समय एक जागरूक व्यक्ति ने भगवान् गोलु देवता से हाईकोर्ट की बलि प्रथा बंद करने पर उनके विचार जानने चाहे। तब गोलू देवता केवल इतना कहा ,”मैं सच्चे मन से चढ़ाये गए  एक फूल से खुश हूँ। ” और गोलू देवता का इतना कहना था कि वहां मौजूद जनता ने गोल्ज्यू की जयकार से पूरा पर्वत गुंजायमान कर दिया।

चम्पावत गोरिलचौड़ से आये उदयपुर के गोलू देवता –

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कहते हैं इन्हे यहाँ चंद राजाओं के सेनापति हरसिंह कैड़ा जी यहाँ लाये थे। उदयपुर गोलु देवता मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसे तत्कालीन राजा उदयचंद ने बनवाया था। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह चम्पावत गोरिलचौड़ का प्रतिरूप है। यहाँ गोलू देवता गढ़ी चम्पावत से  लाकर स्थापित किये गए हैं। इसलिए यहाँ के गोल्ज्यू मंदिर  को ज्यादा तत्काल और जल्दी फल देने वाला मंदिर कहा जाता है। कहते हैं यहाँ नेपाल के राजा द्वारा चढ़ाया ताम्रपत्र भी है। और यहाँ गोलू देवता जब अवतरित होते हैं तो उस समय उनके पश्वा नेपाली टोपी का प्रयोग करते हैं।

उदयपुर के गोलू देवता की यहाँ आने की कहानी  –

हर सिंह कैड़ा चंद राजाओं के वहां सेनापति थे। और गोल्ज्यू चंद राजाओं के सेनापति थे। कहते हैं एक बार राजा ने कैड़ा जी को कोई बड़ा कार्य जितने के लिए दिया था। कई लोग  इस कार्य को खेल प्रतियोगिता बताते हैं और कुछ युद्ध कहते हैं। तब हर सिंह कैड़ा गोल्ज्यू के पास गए उन्होंने गोल्ज्यू से कार्यसिद्धि की प्रार्थना की ,और गोल्ज्यू के आशीर्वाद से कैड़ा जी इस कठिन कार्य में सफल हो गई। उन्होंने भगवान् गोल्ज्यू के मंदिर में आकर उनका आभार व्यक्त किया ,पूजा भेंट चढ़ाई और उनके अनन्य भक्त बन गए।

कैड़ा जी की इस उपलब्धि से खुश होकर चंद राजा ने उन्हें कैड़ा पट्टी का सामंत या क्षेत्र प्रमुख बनाकर यहाँ भेज दिया और कहा की, ‘जाओ आप हमारे तरफ से अपनी कैड़ा पट्टी का राजकाज सम्हालो। ” जब कैड़ा जी यहाँ आने लगे तो उनका मन गोल्ज्यू से अलग होने के लिए राजी नहीं हुवा। उन्होंने मंदिर में जाकर गोल्ज्यू से कहा , हे इष्ट देवता तुमने मेरी इतनी सहायता की है ,अब मेरा मन आप में रम गया है। मैं आपके बिना कैसे रहूँगा ! ” कहते हैं तब गोलू देवता ने उनसे सपने में कहा कि मुझे भी अपने क्षेत्र अपने साथ लेकर चल। मै तेरी भक्ति से खुश हूँ और तेरे साथ आने को राजी हूँ।

कहते हैं उदयपुर के गोल्ज्यू को गोरिलचौड़ चम्पावत से चंद राजाओं के सेनापति श्रीमान हर सिंह कैड़ा जी यहाँ लेकर आये थे। जब सेनापति हरसिंह कैड़ा जी गोरिलचौड़ चम्पावत से पगड़ी पर लपेट ला रहे थे।

कहते हैं कि हरसिंह कैड़ा गोलू देवता की काष्ठ मूर्ती को अपनी पगडी में लपेटकर अपने घोड़े में रातों रात सवार होकर चम्पावत से तीन दिन तीन रात का सफ़र तय कर जब अपने गांव की सीमा से लगभग पांच मील दूर नागभूमि में पहुंचे तो उन्हें आराम करने की इच्छा हुई उन्होंने अपने घोड़े को वहीं एक शहतूत के पेड़ से बाँधा और वहीं एक उचित से स्थान पर पगड़ी भी रख दी जिसमें वह गोलज्यू की मूर्ति को लाये थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद जब वह पगड़ी उठाने लगे तो पगड़ी उसी जगह जमीन में धंसने लगी।

 

 

उदयपुर गोलू देवता मंदिर
उदयपुर गोलू देवता मंदिर

काफी कोशिश के बाद भी जब उनसे पगड़ी उठाई नही गयी तब थक हार कर वह वहीं लेट गए। नींद आने के बाद उनके सपने में गोलू देवता आये और बोले, “मुझे कैड़ा गढ़ ले जाने का तेरा सपना तभी पूरा हो सकता है जब तू किसी परिवार में एक माँ से जन्में आठ पुत्रों को लेकर आएगा! मैं उन्ही के कंधों पर तेरे कैड़ा गढ़ जाऊँगा। ”

तब हर सिंह कैडा अल्मियाँ गॉव गए जहाँ उन्हें आठ भाई अल्मियाँ मिले और उन्ही के कंधों पर सवार गोलू देवता की मूर्ती कैडा गढ़ के उस सुरम्य स्थान पहुंची जिसे बिन्ता-उदयपुर के नाम से जाना जाता है। जबकि लोद नामक उस स्थान पर आज भी वह गड्डा निर्मित है, जहाँ वह पगड़ी जमीन में धंस गई थी। वहां आज भी पूजा होती है। कहते हैं उदयपुर के गोलू देवता आज भी प्रत्यक्ष और तुरंत न्याय देते हैं। निःसन्तानो के लिए तो यह मंदिर किसी तीर्थ से कम नहीं है।

कैसे पहुंचे –

यहाँ पहुंचने के लिए मार्ग बहुत आसान है। आपको कुमाऊं के द्वार हल्द्वानी आना है वहां से रानीखेत के लिए गाड़ी आसानी मिल जाती है। कई गाड़ियां तो बिन्ता तक भी मिल जाती है। बिन्ता से लगभग पांच किलोमीटर की ट्रेकिंग है ,जो एकदम ऊंचाई वाला मार्ग है। उसके बाद दर्शन होते हैं उदयपुर के गोलू देवता के ,और उनके इस मंदिर परिसर की प्राकृतिक सुंदरता देखते बनती है। यहाँ का आद्यात्मिक वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता सारी थकान भुला कर मन में नई स्फूर्ति भर देती है।

यहाँ आप गढ़वाल क्षेत्र से भी आ सकते हैं। कर्णप्रयाग से द्वाराहाट और द्वाराहाट से सोमेश्वर वाले मार्ग पर पड़ता है बिन्ता फिर वहां से चढ़ाई चढ़नी होती है।

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घात डालना – पहाड़ में न्याय के लिए देव द्वार में गुहार लगाना।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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