Saturday, April 19, 2025
Homeसंस्कृतिरम्माण उत्सव, यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित उत्तराखंड का उत्सव

रम्माण उत्सव, यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित उत्तराखंड का उत्सव

रम्माण उत्सव-

रम्माण उत्सव उत्तराखंड के चमोली जनपद के विकासखंड जोशीमठ में पैनखंडा पट्टी के सलूड़ ,डुंग्रा तथा सेलंग आदि गावों में प्रतिवर्ष अप्रैल (बैशाख ) के महीने में आयोजित किया जाता है। रम्माण सलूड़ की 500 वर्ष पुरानी परम्परा है। कहते हैं जब मध्यकाल में सनातन धर्म का प्रभाव काम हो रहा था। तब आदिगुरु शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म में नई जान फुकने के लिए पुरे देश में चार मठो की स्थापना की। मंदिरों की स्थापना की ,तीर्थों की स्थापना की। जोशीमठ के आस पास ,शंकराचार्य जी के आदेश पर उनके कुछ शिष्यों ने , हिन्दू जागरण हेतु  गांव गांव में जाकर ,पौराणिक मुखौटो से नृत्य करके लोगो में जान चेतना जगाने का प्रयास किया। जो धीरे -धीरे इन क्षेत्रों में इस समाज का अभिन्न अंग बन गया।  रामायण से जुड़े प्रसंगो के कारण इसे रम्माण उत्सव कहते हैं। राम से जुड़े प्रसंगो के कारण इसे लोक शैली में प्रस्तुतिकरण ,लोकनाट्य ,स्वाँग ,देवयात्रा ,परमपरागत पूजा अनुष्ठान ,भुम्याल देवता की वार्षिक पूजा ,गावं के देवताओं की वार्षिक भेट आदि आयोजन इस उत्सव में होते हैं। इसमें विभिन्न चरित्र और उनके लकड़ी के मुखोटों को पत्तर कहते हैं। पत्तर शहतूत (केमू ) की लकड़ी पर कलात्मक तरीके से उत्कीर्ण किये होते हैं। रम्माण उत्सव कभी 11 दिनों तक या कभी 13 दिनों तक मनाया जाता है।

रम्माण उत्सव
फोटो साभार -रम्माण मेला सल्यूड पेज

रम्माण में राम ,लक्षमण ,सीता और हनुमान के पात्रों द्वारा लोकनृत्य शैली में रामकथा के चुनिंदा प्रसंगो का प्रस्तुतिकरण ढोल के तालों के साथ किया जाता है। कुछ समय तक लगातार प्रस्तुति देने के बाद जब रामायण के किरदार ,थोड़ा आराम करते है , उस दौरान अन्य ऐतिहासिक व पौराणिक या लोक पात्र आकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। इन पत्तरों में मौर -मौरयाण (पशुपालक और उसकी पत्नी ),बण्या -बनयारण (बनिया और उसकी पत्नी ) कुरु जोगी (मसखरा ) और नरसिंह प्रहलाद पातर मुख्य हैं। रम्माण में मुखौटा नृत्यशैली का प्रयोग किया जाता है। इसमें पात्रों के बीच कोई संवाद नहीं होता। इसमें मुखोटों ,ढोल दमाऊ और भोंकोरों और मजीरों आदि से रम्माण नृत्य का आयोजन होता है। इसमें दो प्रकार के मुखौटों का प्रयोग होता है। पहले वाले को बोलते है ,द्यो पतर अर्थात देवताओं के मुखोटे। दूसरे होते हैं ,ख्यलारी पतर अर्थात मनोरंजन वाले मुखौटे।

रम्माण उत्सव
रम्माण मेला सल्यूड पेज साभार

 रम्माण यूनेस्को द्वार विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित उत्सव –

.वर्ष 2008 में इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स ने दिल्ली में “रामायण अंकन मंचन और वाचन ‘ विषय पर एक सम्मलेन आयोजित किया। इसमें रम्माण को भी शामिल होने का अवसर मिला और इसकी प्रस्तुति की काफी सराहना की गई। इसके बाद इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स ने सलूड़ गावं जाकर सम्पूर्ण रम्माण उत्सव का अभिलेखीकरण किया और सभी आवशयक दस्तावेजों के साथ ,विश्व धरोहर घोषित करने का प्रस्ताव  यूनेस्को को भेजा गया। 02 अक्टूबर 2009 को यूनेस्को ने अबुधाबी में हुई एक बैठक में इस उत्सव को विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया। इस सफलता का श्रेय गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ‘दाताराम पुरोहित ‘ प्रसिद्ध फोटोग्राफर ‘अरविन्द मृदुल ‘ रम्माण लोक गायक ‘थान सिंह नेगी’ तथा डॉ कुशल सिंह भंडारी जी को जाता है।

Hosting sale

इन्हे भी पढ़े: उत्तराखंड की राज्य तितली के बारे में सम्पूर्ण जानकारी

Follow us on Google News Follow us on WhatsApp Channel
Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
RELATED ARTICLES
spot_img
Amazon

Most Popular

Recent Comments