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फूलदेई उत्तराखंड का लोक पर्व | फुलारी | फूलदेई की शुभकामनाएं| Phooldei 2022 | Phulari | Happy phool dei Image 2022

उत्तराखंड वासियों का प्रकृति प्रेम जगविख्यात है। चाहे पेड़ बचाने के लिए चिपको आंदोलन हो या पेड़ लगाने के लिए मैती आंदोलन या प्रकृति का त्योहार हरेला हो। इसी प्रकार प्रकृति को प्रेम प्रकट करने का त्योहार या प्रकृति का आभार प्रकट करने का प्रसिद्ध त्योहार फूलदेई मनाया जाता है।

फूलदेई त्योहार मुख्यतः छोटे छोटे बच्चो द्वारा मनाया जाता है। यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व है।  फूलदेई त्योहार बच्चों द्वारा मनाए जाने के कारण इसे लोक बाल पर्व भी कहते हैं।  प्रसिद्ध त्योहार फूलदेई  चैैत्र मास के प्रथम तिथि को मनाया जाता है। अर्थात प्रत्येक वर्ष मार्च 14 या 15 तारीख को यह त्योहार मनाया जाता है।

2022 में उत्तराखंड का  लोक बाल पर्व फूलदेई त्योहार 14 मार्च 2022 को मनाया  जाएगा

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह से हिंदु नव वर्ष शुरू होता है। चैत्र मास में बसंत ऋतु का आगमन हुआ रहता है। प्रकृति अपने सबसे बेहतरीन रूप में विचरण कर रही होती है। प्रकृति में विभिन्न प्रकार के फूल खिले रहते हैं ।

“देवतुल्य  बच्चों द्वारा  प्रकृति के मनोरम फूलों से  नव वर्ष के स्वागत करते हैं। उत्तराखंड के इस लोक पर्व  को प्रसिद्ध  त्यौहार फूलदेई के नाम से जाना जाता है।”

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फूलदेई त्यौहार 2022
Happy phooldei 2022

फूलदेई मनाने की विधि | Phool dei  festival 2022

उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकपर्व एवं बाल पर्व फूलदेई , छोटे छोटे बच्चे पहले दिन अच्छे ताज़े फूल वन से तोड़ के लाते हैं। जिनमे विशेष प्योंली  के फूल  और बुरॉश के फूल का प्रयोग करते हैं। फूलदेई के दिन सुबह सुबह छोटे छोटे बच्चे अपने वर्तनों में फूल एवं चावल रख कर घर घर जाते हैं । और सब के दरवाजे पर फूल चढ़ा कर फूलदेई के गीत गाते हैं। फूलदेई छम्मा देई और लोग उन्हें बदले में चावल गुड़ और पैसे देते हैं। छोटे छोटे देवतुल्य बच्चे सभी की देहरी में फूल डाल कर शुभता और समृधि का आशीष देते हैं।

उत्तराखंड के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग तरीक़े से फूलदेई का त्यौहार मनाया जाता है। कुछ जगह एक दिन यह त्योहार मनाया जाता हैं। और उत्तराखंड के केदार घाटी में यह त्योहार 8 दिन तक मनाया जाता है। केदारघाटी में चैत्र संक्रांति से चैत्र अष्टमी तक यह त्योहार मनाया जाता है। बच्चे रोज ताजे फूल देहरी पर डालते हैं ,मंगल कामना करते हुए बोलते हैं “जय घोघा माता, प्यूली फूल, जय पैंया पात

अंतिम दिन बच्चे घोघा माता की डोली की  पूजा करके विदाई करके यह त्योहार सम्पन्न करते हैं। वहाँ फूलदेई खेलने वाले बच्चों  को फुलारी कहा जाता है। बच्चो को जो चावल और गुड़ मिलता है। शाम को उसका मीठा पकवान बनाये जाते हैं। कुमाऊ के कुछ क्षेत्रों में उन चावलों के मीठे चावल बनते हैं। और कही उनका हलवा बनाया जाता हैं।

गढ़वाल क्षेत्र में बच्चो को  जो गुड़ चावल मिलते हैं,उनका अंतिम दिन भोग बना कर घोघा माता को भोग लगाया जाता है। घोघा माता  को फूलों की देवी माना जाता है। घोघा माता की पूजा केवल बच्चे ही कर सकते हैं। फुलारी त्योहार के अंतिम दिन बच्चे घोघा माता का डोला सजाकर, उनको भोग लगाकर उनकी पूजा करते हैं।

उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में इसे फुलारी त्योहार के नाम से भी जाना जाता है।

 फूलदेई त्योहार के गीत | फूलदेई की कविता |phool dei poem

फूलदेई के दिन बच्चे उत्तराखंड की लोकभाषा कुमाउनी में एक गीत गाते हुए सभी लोगो के दरवाजों पर फूल डालते हैं, और अपना आशीष वचन देते जाते हैं।

कुमाउनी में बच्चे गाते हैं –

 फूलदेई  छम्मा देई ,

 दैणी द्वार भर भकार।

 यो देली सो बारम्बार ।।

 फूलदेई छम्मा देई

जातुके देला ,उतुके सई ।।

गढ़वाली में फुलारी बच्चे फूल डालते हुए गाते हैं –

ओ फुलारी घौर।

झै माता का भौंर ।
क्यौलिदिदी फुलकंडी गौर ।

डंडी बिराली छौ निकोर।
चला छौरो फुल्लू को।

खांतड़ि मुतड़ी चुल्लू को।
हम छौरो की द्वार पटेली।

तुम घौरों की जिब कटेली।

यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है |  प्योंली की कहानी | इतिहास –

फूलदेई पर एक विशेष पिले रंग के फूल का प्रयोग किया जाता है ,जिसे प्योंली कहा जाता है।  फूलदेई और फुलारी त्योहार के संबंधित उत्तराखंड में बहुत सारी लोककथाएँ प्रचलित हैं। और कुछ लोक कथाएँ  प्योंलि  फूल पर आधारित है। उनमें से एक लोककथा इस प्रकार है।

प्योंली  की कहानी -:

प्योंली नामक एक वनकन्या थी।वो जंगल मे रहती थी। जंगल के सभी लोग उसके दोस्त थे। उसकी वजह जंगल मे हरियाली और सम्रद्धि थी। एक दिन एक देश का राजकुमार उस  जंगल मे आया,उसे प्योंली से प्रेम हो गया और उससे शादी करके अपने देश ले गया ।

प्योंली को अपने ससुराल में मायके की याद आने लगी, अपने जंगल के मित्रों की याद आने लगी। उधर जंगल मे प्योंली बिना  पेड़ पौधें मुरझाने लगे, जंगली जानवर उदास रहने लगे। उधर प्योंली की सास उसे  बहुत परेशान करती थी। प्योंली कि सास उसे मायके जाने नही देती थी।

प्योंली अपनी सास से और अपने पति से उसे मायके भेजने की प्रार्थना करती थी। मगर उसके ससुराल वालों ने उसे नही भेजा। प्योंलि मायके की याद में तड़पते लगी। मायके की याद में  तड़पकर एक दिन  प्योंली मर जाती है।

राजकुमारी के ससुराल वालों ने उसे पास में ही दफना दिया। कुछ दिनों बाद जहां पर प्योंली को दफ़नाया गया था, उस स्थान पर एक सुंदर पीले रंग का फूल खिल गया था। उस फूल का नाम राजकुमारी के नाम से  प्योंली  रख दिया । 

तब से पहाड़ो में प्योंली की याद में फूलों का त्योहार | फूलदेई | फुलारी त्यौहार | मनाया जाता है।

केदार घाटी में एक अन्य क लोक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है –

एक बार भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी केदारघाटी से विहार कर रहे थे । तब देवी  रुक्मिणी भगवान श्री कृष्ण को खूब  चिड़ा देती हैं , जिससे रुष्ट होकर भगवान छिप जाते हैं। देवी रुक्मणी भगवान को ढूढ ढूढ़ कर परेशान हो जाती है। और फ़िर देवी रुक्मिणी देवतुल्य छोटे बच्चों से रोज सबकी देहरी फूलों से सजाने को बोलती है। ताकि बच्चो द्वारा फूलों का स्वागत देख , भगवान अपना गुस्सा त्याग सामने आ जाय। और ऐसा ही होता है,बच्चों द्वारा पवित्र मन से फूलों की सजी देहरी आंगन देखकर भगवान का मन पसीज जाता है।और वो सामने आ जाते हैं।”

तब से इसी खुशी में चैत्र संक्रांति से चैत्र अष्टमी तक बच्चे रोज सबके देहरी व आंगन फूलों से सजाते हैं। और तब से इस त्यौहार को फूल संक्रांति | फूलदेई | फूलों का त्यौहार | फुलारी  आदि नामों से जाना जाता है।

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फूलदेई के त्यौहार की शुभकामनाएं | Happy phooldei 2022 –

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फूल देइ
Happy phooldei 2022

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