सात जन्मों का दोस्ती का बंधन है – उत्तराखंड कुमाऊँ की मिज्जू परम्परा || Friendship day 2021 in Uttarakhand || Friendship day 2021 special

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Pahadi friendship day special 2021 – उत्तराखंड की अनोखी मिज्जू परम्परा

प्रत्येक वर्ष अगस्त के पहले रविवार को आधुनिक युवा मित्रता दिवस मनाते हैं। और आज के डिजिटल युग मे मित्रता जोड़ने  के लिए सोशल मीडिया सबसे बड़ा साधन है। इसके बाद भी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ नही होती, जितनी उत्तराखंड की मिज्जू परम्परा में हो जाती थी, और अभी भी होती है।

उत्तराखंड कुमाऊँ मंडल के चंपावत जिले तथा सीमांत क्षेत्रों में सदियों से एक अनोखी परम्परा चली आ रही है, जिसे मिज्जू परम्परा कहा जाता है। इस परंपरा का मूल कार्य , कुमाऊ के अलग अलग जाती ,समुदाय ,अलग अलग वर्गों के बीच अटूट मित्रता स्थापित करना है। दो अलग अलग जाती, सम्प्रदाय, के दो लोगो के बीच मित्रता कराने को मिज्जू परम्परा कहते हैं।

कहा जाता है, कि मिज्जू लगाने वाले 2 परिवारों बीच 7 जन्म तक यह अटूट दोस्ती का रिश्ता निभाया जाता  है।

 

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कैसे शुरू हुई कुमाऊँ में मिज्जू परम्परा –

बताया जाता है, सदियों पहले कि कुमाऊँ के चन्द्रवंशी राजाओं ने इस अनोखी परम्परा को शुरू किया था। कुमाऊँ के अलग अलग जातियों और समुदायों के बीच दोस्ती मजबूत करने के लिए इस परंपरा की शुरुआत की गई थी।और कुमाऊँ के कई इलाकों में या परम्परा अभी भी चल रही है।

इतिहासकारों के अनुसार, जाती ,कुल ,गोत्र आदि के बंधनों से मुक्त होकर दो अजनबी परिवारों के बीच मिज्जू लगाया जाता था, और अभी भी लगाया जाता है। चाहे वो गरीब वर्ग हो या अमीर वर्ग  सभी बंधनों से बाहर निकल कर वो अपने मिज्जू परम्परा को निभाता है। जिसके साथ मिज्जू लगाया है, वो दोनो मित्र पूरी ईमानदारी से मिज्जू मित्रता को निभाते हैं। और विश्वास रखते हैं कि अगले सात जन्म तक एक दूसरे का साथ यू ही निभाएंगे।

यह परम्परा उस समय के राजाओं, जिहोने मिज्जू बनाया, उनके सोच, उनके दर्शन को दर्शाता है, कि कितने अच्छे उनके विचार और उनकी सोच होगी अपने उत्तराखंड के बारे में।

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मिज्जू परम्परा
मिज्जु परम्परा में गन्धराक्षत करते दो मित्र।फ़ोटो सभार – अमर उजाला

कैसे लगाते हैं, मिज्जू परम्परा।

दोस्ती कैसे निभाते है, कोई उत्तराखंड के लोगो से सीखे, खाली मित्रता मित्रता दिवस मना कर मित्रता का ढोंग करते हैं।

सबसे पहले आपस मे मिज्जू लगाने वाले परिवारों के बीच गन्धराक्षत ( पिठ्या टिका ) की रस्म होती है । फिर अपने कुल देवता की पूजा की जाती है,उनसे अपनी दोस्ती पर सदा कायम रहने का वर मांगा जाता है। यहाँ से दो व्यक्तियों के बीच अटूट रिश्ते की शुरुवात होती है। इसके ततपश्चात आपस मे मिज्जू लगाने वाले दोनो परिवार , पूरे गाँव को मीट भात का भोजन कराया जाता है। जैसे पुरुष आपस मे मिज्जू लगाकर दोस्ती मजबूत करते है,वैसे ही उस क्षेत्र की महिलाएं आपस मे संगज्यू लगाकर अपनी दोस्ती मजबूत करती है।

उत्तराखंड की अनोखी परम्परायें , भारत के साथ पूरे विश्व का मार्गदर्शन करके सभी को एक सभ्य सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करती हैं।

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