Wednesday, June 19, 2024
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झोड़ा चाचरी उत्तराखंड के लोकनृत्य और कुमाउनी झोड़ा गीत लिरिक्स

कुमाउनी झोड़ा का अर्थ और खोल दे माता खोल भवानी झोड़ा लिरिक्स।

झोड़ा उत्तराखंड का लोकनृत्य

झोड़ा उत्तराखंड का एक लोकनृत्य गान है। यह उत्तराखंड के कुमाउनी क्षेत्र में गाया औऱ प्रदर्शित किया जाता है। लोकनृत्य गान इसलिए बोला,यह एक ऐसा लोक नृत्य है, जिसमे स्थानीय लोग सामुहिक रूप से हाथ पकड़ कर वृत्ताकार ,पदताल मिलाते हुए नाचते हैं। और साथ – साथ लोक गीत भी गाते हैं।
बीच मे एक वाद्य यंत्र बजाने वाला होता है। जो पद बोलता है, और गोल घेरे में हाथ पकड़ कर ,एक विशेष चाल में नाचने वाले स्त्री पुरूष उन पदों को दोहराते हैं। और कहीं -कही स्त्री दल एक पद की शुरुआत करते हैं, और पुरूष दल उन्हें दोहराते हैं।
झोड़ा उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का प्रसिद्ध लोक नृत्य है। जिसमे स्त्री व पुरुष सामुहिक रूप से भाग लेते हैं।हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी ऐसे ही लोकनृत्य का आयोजन किया जाता है। जिसे हथजोड़ा कहते हैं। इस प्रकार इसका मतलब हुवा हाथों को जोड़कर किया जाने वाला नृत्य।

झोड़ा नृत्य में हाथों में हाथ डालकर ,उन्मुक्तता के साथ निश्चित गति और लय पर एक खास शैली के साथ ,गोलाकार घेरे में नृत्य करने वाले पुरुष व महिलाएं ,हुड़के की थाप पर इस लोकनृत्य का आयोजन करते हैं। यह एक सामुहिक नृत्य है। चैत्र मास में तथा मेलों और शुभ धार्मिक कार्यों ,विवाह आदि के अवसर पर झोड़ा नृत्य का आयोजन किया जाता है। अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर घाटी और बोरारो घाटी के झोड़े बहुत प्रसिद्ध हैं। झोड़ा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के झटति से मानी जाती है। इसमे पद संचालन और लय दोनों तेज होते हैं।

कुमाऊं में झोड़ा गीतों के दो रूप प्रचलित हैं – मुक्तक और प्रबंधात्मक झोड़े । मुक्तक झोड़े चाचरी ही होती हैं। और प्रबंधात्मक झोड़ो में लोकदेवी देवताओं और ऐतिहासिक महापुरुषों के गुणगान होते हैं। झोड़ा नृत्य की गायन शैली धार्मिक, श्रंगार और सामाजिक होती है। हास्य व्यंजना, मनोरंजन और कौतूहल से सम्बंधित गीतों को झोड़ो में गाया जाता है।

चाँचरी

उत्तराखंड के कुमाऊं का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, चाँचरी। इसमे स्त्री और पुरुष दोनों समान नृत्य करते हैं। यह झोड़े का एक रूप है। शायद इसका उदभव झोड़े से हुवा है या झोड़े का जन्म चाँचरी से हुवा है। इसका स्वरूप झोड़ा नृत्य से काफी मिलता जुलता है। झोड़ा और चाँचरी में ज्यादा अंतर नही होता है।

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चाँचरी शब्द को संस्कृत के चंचरी शब्द से लिया गया है। इसका अर्थ होता है, भौरा या चंचल गति। इस लोकनृत्य में स्त्री तथा पुरुष एकदूसरे के कमर में हाथ डालकर या कंधे पकड़कर अर्ध गोला बनाते हुए लोक नृत्य करते हैं। उत्तराखंड दानपुर की चाँचरी बहुत प्रसिद्ध है। हुड़का इसका प्रमुख वाद्य है।

हुड़के की थाप पर मुख्य गायक की आरोह के साथ,आरोह पैदा होता है। कोरस के रूप में नर्तक ,सहगायक के रुप मे , मुख्य गायक की ध्वनि को विस्तार देते हैं। कभी कभी गीतों में प्रतिस्पर्धा भी होती है ।और आपस मे प्रश्न उत्तर भी चलते हैं। इसी कारण यह लोक नृत्य घंटो भी चलते हैं।

चाँचरी में झोड़े की तरह पद्संचालन और आंगिक अभिनय विशिष्ट होता है। प्रत्येक नर्तक को पद्संचालन का विशिष्ट ध्यान रखना पड़ता है। एक निश्चित नृत्य योजना के अंतर्गत दाएं पैर को बाहर और बायें पैर को अंदर लिया जाता है। इसी कार्य को ,संतुलित रूप तेज किया जाता है, तो लोकनृत्य का रूप धारण कर लेता है।

झोड़ा
उत्तराखंड का लोक नृत्य झोड़ा

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कुमाऊनी झोड़ा खोली दे माता खोल भवानी धरमा किवाड़ा  –

खोली दे माता खोली भवानी एक प्रसिद्ध कुमाऊनी झोड़ा  है। जिसमे भक्त और माता रानी के मध्य एक प्यारा सा संवाद है।  जिसमे भक्त कहते हैं, हे माता अपने मंदिर के किवाड़ खोल दे। तब माता पूछती है , पहले बता चढ़ावे में क्या लाया है भक्त ? क्या खोलू केवाङ । आइये इस प्रसिद्ध कुमाऊनी झोड़े का कुमाउनी भाषा मे आनंद लेते हैं।

ओहो धौली गंगा भागीरथी को के भलो रेवाड़ा।
ओहो धौली गंगा भागीरथी को के भलो रेवाड़ा ।।
ओहो खोल दे माता खोल भवानी धारमा  केवाड़ा।
ओहो खोल दे माता खोल भवानी धारमा केवाड़ा ।।
ओहो के लयारेछे भेट पखोवा के खोलुँ केवाड़ा ।
ओहो के लयारेछे भेट पखोवा के खोलुँ केवाड़ा ।।
ओहो फुल चडूलो ,पाती चडूलो तेरो दरबारा ।
ओहो पान सुपारी, नैरयो लयरु तेरो दरबारा ।।
ओहो पान सुपारी, नैरयो लयरु तेरो दरबारा ।।
ओहो खोल दे माता खोल भवानी धारमा केवाड़ा ।
ओहो खोल दे माता खोल भवानी धरमा केवाड़ा ।।

इस झोड़े में मुख्यतः 2 या 4 पद मुख्य हैं ।बाकी क्षेत्रीय अनुसार लोग इसमें और पद जोड़ देते हैं।

चौकोटे की पार्वती , कुमाउनी झोड़ा –

चौकोटे की पार्वती त्वीलै धारो बोला बली ।
त्वीले धारो बोला ….
मासी को प्रताप लौंडा, त्वीलै धारो बोला बली
त्वीले धारो बोला .. ।
ग्यूं खाया ससले बलि । चौकोटी में खाली तेरी
हिटछे उसले बलि। हिटछै उसले बली ।
चौकोटै की….
मासी को……
मांछी को रगत बली । मांछी को रगत बलि ।
तू मेरि जोग्याण बली। मैं तेरों भगत बलि।
चौकोटे की पार्वती…
मासि को…
पाणि की नहर बलि। पाणि की नहर बलि ।
कि तु आ कि मैं लिजा, कि दि जा जहर बलि।
चकोटै की पार्वती …
मासि को….
पिसुआ का गुना वली। पिसुआ का गुना बलि ।।
मायादार मैं ले भयूं ,तू छ अनाधुना बलि ।।
चकोटे की पार्वती …
मासि को को प्रताप लौंडा …
पाणि की नहर बली, पाणि की नहर बलि ।
कि तुआ, कि मैं लिजा , कि दि जा जहर बलि ।।
चौकोटै कि पार्वती …
मासी को प्रताप लौंडा …
पिसुआ का गुना बलि, पिसुआ का गुना बलि ।।
मायादार मैं लं भयं,  तू छं अनाधुना बलि ।।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
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