Home मंदिर जागेश्वर धाम उत्तराखंड के पांचवा धाम का इतिहास और पौराणिक कथा।

जागेश्वर धाम उत्तराखंड के पांचवा धाम का इतिहास और पौराणिक कथा।

Jageshwar dham Uttarakhand

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जागेश्वर धाम का इतिहास

जागेश्वर धाम शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है। यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा मंदिर समूह है। यह मंदिर कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा जिले से 38 किलोमीटर की दुरी पर देवदार के जंगलो के बीच में स्थित है। जागेश्वर धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मंदिरों की एक नगरी है। जागेश्वर मंदिर में 124 मंदिरों का समूह है। जिसमे 4-5 मंदिर प्रमुख है जिनमे विधि के अनुसार पूजा होती है। यह मंदिर नगरी समुद्रतल से लगभग 1870 मीटर की उचाई पर स्थित है। दारुकवन में देवदार के जंगल के बीच मृत्युंजय मंदिर में स्थित शिवलिंग को ‘नागेश जागेश दारुकवने’ आधार पर शकराचार्य जी द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिंगों में से चौथा ज्योतिर्लिग माना गया है।

जागेश्वर धाम का इतिहास

शिव पुराण में बताया गया है कि सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग की स्थापना जागेश्वर में हुई थी। अर्थात सबसे पहले शिवलिंग पूजा यहीं से हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार इसकी स्थापना  मूलतः उत्तराखंड के नाग शाशको ने की थी। उन्होंने यहाँ एक विशाल यज्ञ करवाया था ,फिर उसके बाद भगवान् भोलेनाथ के इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। इसीलिए इसे यज्ञेश्वर कहा गया जो कालांतर में जागेश्वर हो गया। जागेश्वर के नामकरण के सन्दर्भ में यह भी कहा जाता है कि यहाँ भगवान् शिव ने योगेश्वर रूप में तपस्या की थी। इसलिए इसका नाम योगेश्वर और बाद में जागेश्वर हो गया। इसके अलावा किन्तु स्कन्द पुराण के मानसखंड में इसे ‘जागीश्वर’ कहा गया है।

दारुकानन मध्ये वै सम्प्राप्ता सरितांवरा ।
सापुण्यालक नन्दाख्या मम पदा विनिसृता ।।
तयो संगम मध्ये वै देवो जागीश्वराह्वयः ।
जागर्ति सर्वपापानां नाशाय परमेश्वरः ।।

स्कन्द पुराण के मानसखंड के अनुसार यह स्थान सप्तर्षियों की तपोभूमि था। उनके द्वारा यहां पर ‘यज्ञेश भगवान् शंकर के लिए मोक्षप्रद यज्ञ का आयोजन किये जाने के कारण यह  ‘यज्ञेश’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया जो कि कालान्तर में ‘जागेश’ होकर  उसमे ईश्वर जुड़कर जागेश्वर हो गया।

सबसे पहले शिवलिंग पूजन यहीं से शुरू हुआ था

कहते है कि सबसे पहले यहां के ज्योतिर्लिंग की स्थापना से ही विश्व में शिवलिंग का पूजन प्रारम्भ
हुआ था। इस संदर्भ में यह भी कहा गया है कि मूलत: इसकी स्थापना यहां से 3 किमी. की दूरी पर स्थित उस पर्वत
शिखर पर की गयी थी, जिसे ‘वृद्धजागेश्वर’ कहा जाता है। यहां पर स्थित पौण राजा की पीतल की प्रतिमा से प्रतीत होता है कि कभी यहां पर कुणिन्द नरेशों का भी आधिपत्य रहा है। क्योंकि इतिहासकारों का कहना है कि ‘पौण’ कुणिन्द शासकों की उपाधि थी जिसका संकेत कालसी से प्राप्त द्वितीय शताब्दि के किसी वार्षगण्य गोत्रीय पौण राजा की यज्ञवेदी के इष्टिका लेख में मिलता है- नृपतेः वार्षगण्यस्य पौणषष्ठस्य धीमतः।

जागेश्वर धाम नंदी महाराज की स्थापना नहीं है

जागेश्वर वस्तुतः एक देवालय नहीं अपितु एक देवालयपुंज है जिसमें छोटे-बड़े कुल मिलाकर 124 मंदिर हैं। कहा जाता है कि पहले इनकी संख्या 150 के करती थी। इनमे से वास्तुकला और पौराणिक महत्व के लिए जागेश्वर ( कैलाशपति ,जागनाथ ,) और मृत्युंजय मंदिर खास प्रसिद्ध हैं। इस मंदिर की एक और खास विशेषता है ,यहाँ भगवान् शिव के अन्य मंदिरों की तरह नंदी महाराज की स्थापना नहीं है। इसका कारण यह बताया जाता है कि ,भगवान शिव ने यहाँ त्रिदेव रूप में प्रकट थे। इसलिए केवल शिव रूप के लिए वाहन की स्थापना नहीं की गयी।

निर्माण व स्थापत्यकला

पौराणिक कहानियों व् मान्यताओं के आधार पर इसका निर्माण का श्रेय देवशिल्पी विश्कर्मा को दिया गया है किन्तु जागेश्वर के इतिहास के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने जागेश्वर के तथा राजा शालिवाहन ने मृत्युञ्जय के मंदिर का जीर्णोद्धार किया था। कालान्तर में यहां के कत्यूरी शासकों के द्वारा यहां पर सूर्य, पुष्टिदेवी, नवदुर्गा, भवानी, स्वयंभू, नागेश, महिषासुरमर्दिनी, नवग्रह, बालेश्वर, केदारनाथ, नटेश्वर, लक्ष्मेश्वर, कुबेर, नारायणी आदि नाम से अनेक छोटे-बड़े मंदिरों की स्थापना की जाती रही है। मंदिर स्थापत्य की विशेषता की दृष्टि से इनका निर्माणकाल 8वीं से 10वीं शताब्दि के आसपास का, जो कि कत्यूरी काल था, माना जाता है। इस काल में यह क्षेत्र लकुलीश शैवों का भी प्रमुख केन्द्र रहा है जिसका प्रमाण यहां के शिवलिंगों पर भी देखा जाता है। किन्तु शिल्पविशेषज्ञों के द्वारा इन्हें जिन चार शैलियों के अन्तर्गत रखा जाता है, वे हैं-

रेखादेवल शैली में जागेश्वर तथा मृत्युञ्जय मंदिर।
पीढ़ा देवल शैली में केदारनाथ व बालेश्वर मंदिर।
बल्लभ शैली में दुर्गा एवं पुष्टिदेवी मंदिर।
अनामित शैली में अन्य छोटे-बड़े मंदिर।

जागेश्वर तथा मृत्युञ्जय के मंदिरों की दीवारों एवं स्तम्भों पर देवमातृका एवं देवनागरी लिपियों में संस्कृत एवं अपभ्रंश भाषाओं के  छोटे-छोटे अभिलेख भी उत्कीर्ण मिलते हैं। जागेश्वर के मंदिर में हाथ में दीपकयुक्त थाल थामे हुए चन्दराजा’ दीपचन्द (1748-77ई.) की तथा एक उसकी रानी की कास्य मूर्ति है। तथा बाएं कोने में राजा तिमलचंन्द की चांदी की प्रतिमा भी थी ,जो 1968 में चोरी हो गई थी।

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कामदेव ने यहाँ के दंडेश्वर की शिला पर बैठ कर शिव का ध्यान भंग किया था

यहाँ के मंदिर समूहों में एक मंदिर है ,जिसका नाम है दंडेश्वर मंदिर। इस मंदिर में कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं है। लेकिन यहाँ एक प्राकृतिक शिला है। कहते हैं कामदेव ने इस शिला पर बैठकर भगवान् भोलेनाथ की तपस्या भंग करने का दुस्साहस किया था। और भगवान् शिव के कोप का भजन बने थे।

जागेश्वर धाम का धार्मिक महत्व

इस धाम का धार्मिक महत्व और पौराणिक महत्व अद्वितीय है। यह वही स्थल है जहां से लिंग पूजन की परम्परा शुरू हुई थी। इसे उत्तराखंड का पांचवा धाम भी कहा जाता है। यहाँ श्रावण माह में पार्थिव पूजा और रुद्राभिषेक का विशेष महत्त्व है। इसके अलावा यहाँ बैशाख और कार्तिक की पूर्णमासी का भी विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन तथा महाशिवरात्रि को विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है। इसमें निसंतान औरतें ,भगवान् शिव की मूर्ति के सामने हाथ में दीपक रखकर ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए रात्री जागरण करती हैं, तो भगवान शिव उन्हें संतान प्राप्ति का वर देते हैं।

जागेश्वर धाम का इतिहास का संदर्भ –
इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी ऐतिहासिक तथ्यों का संदर्भ प्रो dd शर्मा जी की पुस्तक ” उत्तराखंड ज्ञानकोष ” से लिया है।

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