Wednesday, April 2, 2025
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हरियाली देवी मंदिर, उत्तराखंड में बसा है योगमाया का यह पवित्र धाम

Hariyali devi temple Uttarakhand

हरियाली देवी मंदिर, हरियाली देवी  को समर्पित यह प्राचीन सिद्धपीठ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में अव्यस्थित है। हरियाली माई की बाला और वैष्णो देवी के रूप में भी पूजा की जाती है।

हरियाली देवी मंदिर ,उत्तराखंड रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू – डांडाखाल रोड पर गौचर के बीच जसोली गावँ में स्थित है। यह प्रसिद्ध सिद्ध पीठ समुद्र तल से 1371 किमी की उचाई पर स्थित है। नगरासू से जसोली गांव लगभग 22 किलोमीटर दूर है। और जसोली गांव जहाँ हरियाली माता का मंदिर है वहां से लगभग 8 किलोमीटर दूर हरियाली कांठा में स्वयंभू भगवान् भोलेनाथ का शिवलिंग व्यस्थित है। इस पर्वत को हरी पर्वत या हरियाल पर्वत भी कहते हैं। हरियाली देवी मंदिर भारत के 58 सिद्धपीठों में से एक है।

हरियाली मंदिर का इतिहास व् पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं  के अनुसार , द्वापर युग में अत्याचारी कंस ने अपनी बहन देवकी के सभी सन्तानो को मार दिया था ,तब आठवीं संतान के रूप में भगवान् कृष्ण ने जन्म लिया और उधर गोकुल में ,योगमाया ने कन्या के रूप में जन्म लिया। जब भगवान् की इच्छा से दोनों की अदला बदली की गई तो ,कृष्ण गोकुल चले गए और योगमाया रूपी कन्या कंस के हाथ लग गई। जब कंस ने उसे जोर से जमीन पर पटका तो, उसके शरीर के टुकड़े अलग अलग स्थानों में गिरे और वहीँ देवी माँ के  सिद्धपीठ की स्थापना हुई।

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ऐसी प्रकार रुद्रप्रयाग के हरियाली कांठा में माता की जांघ गिरी तो वहां मंदिर बन गया। कुछ कथाकार कहते हैं कि कंस के हाथ से गायब  होने के बाद ,देवी हरियाली कंठा से प्रकट हुई। इस मंदिर की खोज सर्वप्रथम ग्राम पाबो के ग्रामवासियों ने की, गांववालों ने देखा की एक गाय हमेशा अपना दूध जंगल में खाली कर आ जाती है। एक दिन पता लगाने की नियत से गांव वाले उस गाय के पीछे जंगल में गए तो वहां उन्होंने देखा कि गाय वहाँ हरी पर्वत  पर अपना दूध चढ़ा रही है। लोगो ने वहां पर माता का मंदिर स्थापित कर दिया।  हरी पर्वत पर मंदिर होने के कारण, यह मंदिर हरियाली देवी मंदिर कहलाया।

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हरियाली कंठा का मंदिर मार्ग अति दुर्गम होने के कारण वहां प्रतिदिन पूजा पाठ नहीं हो सकती थी इसलिए निचे जसोली गावं में एक अन्य मंदिर स्थापित किया गया जिसका नाम हरियाली देवी है। इस मंदिर में मुख्यतः तीन मूर्तियां हैं, पहली माँ हरियाली देवी की मूर्ति है, दूसरी मूर्ति यहाँ के क्षेत्रपाल देवता की है।  और तीसरी मूर्ति हीत देवी की है।

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हरियाली देवी की यात्रा

हरियाली देवी की राज जात अपने आप मे उत्तराखंड की अनोखी राज जात है। जो रात में चलती और सुबह गंतव्य तक पहुच जाती है। हरसाल में दो बार हरियाली कांठा में मुख्य मंदिर में दर्शनों के लिए जाते हैं। पहली यात्रा रक्षाबंधन के दिन की जाती है। दूसरी यात्रा दीपवाली के समय होती है।

दीपावली में देवी के स्नान के लिए पाबौ गांव के लोग उस गाय का दूध लाते हैं,जिसका सींग ना टुटा हो। तिरोदशी की रात को जसोली गावं से ,हरियाली देवी की डोली लाटू और हीत देवी के साथ निशान सहित प्रस्थान करती है। रस्ते में कोदिमा नामक गावं में दो घंटे का विश्राम किया जाता है।इसी विश्राम के अंतर्गत भजन कीर्तन  होते हैं। कोदिमा से रात 10 बजे आगे बढ़ते हुए , बाँसो नमक स्थान पर डोली और यात्रियों का विश्राम होता है। भजन कीर्तन पूर्वतः चलते रहते हैं।

इसके बाद पंचरंगया नामक स्थान पर सूक्ष्म विश्राम के साथ देवी स्नानं के लिए जल की व्यवस्था यहीं  होती है। यही पुजारी व् भक्तगण स्नान करते हैं। यहाँ से देवी की डोली सीधे हरी पर्वत के लिए प्रस्थान करती है। और सुबह सूर्योदय के साथ हरियाली कंठा स्थित मूल  मंदिर हरियाली देवी के प्रांगण में पहुंच जाती हैं। उसके बाद हरियाली कांठा में ,पूजा पाठ और माता का पुजारी के शरीर में अवतार लेकर सभी क्षेत्रवासियों को आशीष देती है।

इसके बाद वापस जसोली के लिए प्रस्थान करते हैं। कोदिमा , बसों और जसोली में माता की डोली की पूजा होती है। इस यात्रा में ढोल दमऊ वाले जसोली से कोदिमा तक ही जाते है। इस यात्रा में देवी के रक्षक लाटू और हीत डोली के आस पास रहते हैं।

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 यात्रा और मंदिर में पूजा के कठोर नियम हैं

हरियाली देवी शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व बहुत है। यहाँ पौराणिक परम्परायें आज भी जीवंत हैं।यहां परम्पराओं के साथ आज भी सात्विक नियमो का कठोरता से पालन किया जाता है।मंदिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को लगभग एक सप्ताह पूर्व मांस मदिरा और प्याज लहसुन का त्याग करना पड़ता है। यात्रा में जसोली से हरियाली कांठे तक कि यात्रा नंगे पांव की जाती है। मेले में गए यात्रियों के लिए कम्बल बर्तन की व्यवस्था होती है। सूखा राशन  घर से लेकर जाना पड़ता है।

जसोली गावँ में जन्माष्टमी धूम धाम से मनाई जाती है। और इस मंदिर में हरियाली बोई जाती है। जिसे नवमी के दिन काट कर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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