अलविदा ‘पहाड़ों की आवाज़’: उत्तराखंड की लोक संस्कृति और कुमाऊंनी संगीत जगत के लिए आज एक अत्यंत दुखद खबर सामने आई है। अपनी जादुई आवाज़ से दशकों तक पहाड़ों की वादियों को गुंजायमान करने वाले प्रसिद्ध लोक गायक दीवान कनवाल अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से संगीत जगत और उनके लाखों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है।
कुमाऊँ की ठंडी हवाओं जैसी मिठास थी उनकी आवाज़ में
दीवान कनवाल केवल एक गायक नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर के सच्चे संवाहक थे। उनकी आवाज़ में कुमाऊँ की ठंडी हवाओं की मिठास और पहाड़ों की वह पुकार थी, जो सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाती थी। उनके गीतों ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि उत्तराखंड की परंपराओं और जीवन दर्शन को जीवंत रखा।
कालजयी गीत जो हमेशा रहेंगे अमर
दीवान कनवाल जी ने अपनी गायकी से कई ऐसे गीत दिए जो आज भी हर पहाड़ी की जुबान पर बसे हुए हैं। उनके कुछ प्रमुख चर्चित गीत निम्नलिखित हैं:
- “आज कु छे मेत जा” (भावुक कर देने वाली पुकार)
- “हिट मेरी रंगीली” (प्रेम और उल्लास का प्रतीक)
- “त्यार पहाड़ म्यार पहाड़” (पहाड़ की मिट्टी से जुड़ाव की दास्ताँ)
उनके ये गीत महज़ संगीत की धुनें नहीं, बल्कि विरह की पीड़ा, प्रेम की कोमलता और पहाड़ों के जनजीवन का एक जीवंत दस्तावेज़ हैं।
संस्कृति के एक स्तंभ का ढहना
संगीत प्रेमियों का कहना है कि दीवान जी के जाने से उत्तराखंड की लोक संस्कृति में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। उन्होंने आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहकर नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का अतुलनीय कार्य किया।
“ईश्वर उनकी पवित्र आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोक संतप्त परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहने की शक्ति प्रदान करें।”
आज पूरा उत्तराखंड नम आंखों से अपने इस लाडले गायक को विदाई दे रहा है। भले ही वे शारीरिक रूप से विदा हो गए हों, लेकिन उनकी आवाज़ यहाँ के बांज-बुरांश के जंगलों और बर्फीली चोटियों में हमेशा गूंजती रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि! 🙏🏻
