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जब गोरिल देवता ने धर्म बहिन तम्बोला घुघूती की पुकार पर उजाड़ डाला डोटी गढ़

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गोरिल देवता या गोलू देवता को उत्तराखंड के प्रमुख न्यायकारी देवता माना जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि जो उनकी शरण में चला जाता है ,उसकी रक्षा के लिए वे किसी हद तक जा सकते हैं। गोरिल देवता की जागर में गोलू देवता और तम्बोला घुघूती की कहानी गायी जाती है। आज इस पोस्ट में गोरिल देवता और तम्बोला घुघूती की कहानी का हिंदी में संक्षिप्त वर्णन कर रहें हैं।

गोरिल देवता और तम्बोला घुघूती की जागर कहानी –

कहते हैं एक बार एक तम्बोला नामक घुघुती गोलू देवता के राज्य गढ़ी चम्पावत में आती है। और उनके आवास के निकट वृक्ष में अपना घोसला बना लेती है।इस पक्षी से गोलू देवता को इतना प्यार होता है कि वे तम्बोला घुघुती को अपनी धर्म बहिन बना लेते हैं। तम्बोला घुघुती उस घोसले में अंडे देकर उनसे जन्मे बच्चों का बड़े स्नेह से पालन-पोषण करती है।

गोरिल देवता भी अपने भांजे-भांजियों को बहुत प्यार करते हैं। एक दिन जब तम्बोला घुघुती बाहर गई होती है, तब डोटीगढ़ नेपाल के ग्वाले आकर घुघुती का घोसला तोड़ कर, बच्चों को पटक कर मार देते हैं। जब तम्बोला घुघुती वापस आती है, तब अपने बच्चों को मृत देख खूब विलाप करती है। तब उसके आँसू गोलू देवता की कटार पर गिरते हैं। तब गोलू देवता अपनी बहन को रोते बिलखते देख गुस्सा हो जाते हैं। और अपनी धर्म बहिन तम्बोला छूछूती से सारा वृतान्त सुनकर गोलू बदला लेने के लिए, अपराधियों को दंडित करने के लिए डोटी गढ़ चले जाते हैं।

जब गोरिल देवता ने धर्म बहिन तम्बोला घुघूती की पुकार पर उजाड़ डाला डोटी गढ़

डोटी गढ़ के राजा और दरबारी सफेद घोड़े मे आए गोरिल देवता की बात सुनना छोड़ उसका मजाक उड़ाते तब गोलू देवता का गुस्सा भड़क गया। वहां भयंकर युद्ध छिड़ गया। गोलज्यू ने डोटीगढ़ को तहस नहस कर डाला। अपराधियों को दंड देकर जब गोल देव चम्पावत वापस आए, तब उन्होने अपने अमृत कलश से जल की बूंदें छिड़ककर बोला घूघूती के बच्चों को जिंदा कर दिया ।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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