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फ्यूंलानारायण मंदिर – देश का एकमात्र मंदिर जहाँ महिला पुजारी ही करती है भगवान् नारायण का शृंगार।

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फ्यूंलानारायण मंदिर –

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है यहाँ साक्षात् देवो का वास है। उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अपने आप में कई अद्भुत रहस्यों को समेटे हुए है। और अपनी अनोखी मान्यताओं और समृद्ध संस्कृति के लिए हिमालय का यह भूभाग ( केदारखंड और मानसखंड ) हमेशा चर्चाओं में रहा है।

उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक के उर्गम घाटी में भगवान् नारायण का ऐसा ही एक रहस्यमई मंदिर है जहाँ पुरुष पुजारी के साथ महिला पुजारी भी नियुक्त है और प्रतिदिन भगवान् का शृंगार केवल महिला पुजारी करती है। समुद्रतल से लगभग 10000 फ़ीट की ऊंचाई पर और बद्रीनाथ राष्ट्रिय राजमार्ग जोशीमठ से लगभग 12 किलोमीटर दूर जोशीमठ की उर्गम घाटी के भर्की गांव के बीच में स्थित है भगवान् विष्णु का मंदिर।

इस मंदिर को फ्यूंलानारायण मंदिर के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष श्रावण संक्रांति को विधि विधान से इस मंदिर के कपाट खुलते हैं। वर्ष 2024 में भी पुरे विधि विधान के साथ 17 जुलाई को इस मंदिर के कपाट दर्शनार्थ खुल चुके हैं।

केवल डेढ़ माह के लिए खुलते हैं कपाट –

भगवान् नारायण को समर्पित फ्यूंलानारायण मंदिर के कपाट केवल डेढ़ माह के लिए खुलते हैं। भगवान् विष्णु के इस मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष श्रावण संक्रांति  16 या 17 जुलाई को खुलते हैं और नंदाष्टमी को कपाट एक साल के लिए बंद हो जाते हैं। इस दौरान मंदिर की पूजा के लिए पुरुष पुजारी और भगवान श्रीहरि के शृंगार के लिए महिला पुजारी नियुक्त होती है। यहाँ की पुरातन परम्परा के अनुसार यहाँ भगवान् का शृंगार करने का अधिकार केवल महिलाओं को होता है। इसलिए यहाँ महिला पुजारी की नियुक्ति होती है। कपाट बंद होने के समय मंदिर की सजावट कुंवारी कन्याओं द्वारा की जाती है।

इसके अलावा महिला पुजारी द्वारा  प्रतिदिन दूध,दही घी माखन और सत्तू का भोग भगवान् नारायण को लगाया जाता है। इस मंदिर में यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। आज भी यहाँ के ग्रामीण सदियों से चली आ रही इस परम्परा का निर्वहन पूरी ईमानदारी और लगन से करते हैं।

फ्यूंलानारायण मंदिर

स्वर्ग की अप्सरा से चली यह विशेष परम्परा –

उत्तराखंड का संभवतः भारत का एकमात्र मंदिर है जहाँ प्राचीन काल से महिला पुजारी नियुक्त करने की परम्परा है। हलाकि आजकल कई मंदिरों में महिला पुजारियों की नियुक्ति हो रही है ,लेकिन फ्यूंलानारायण मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ यह परम्परा स्वयं भगवान् विष्णु ने शुरू की। जी हाँ एक पौराणिक लोककथा के अनुसार पौराणिक काल में जब स्वर्ग की अप्सरा पुष्प लेने हिमालय की इस सुन्दर उर्गम घाटी में आई तो उसे यह स्वयं भगवान् विष्णु यहाँ से विचरण करते हुए मिल गए।

कहते हैं स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी ने भगवान् विष्णु को एक फूलों की माला भेंट की और कई भिन्न -भिन्न प्रकार के फूलों से भगवान् नारायण का शृंगार किया। कहा जाता है तबसे फ्यूंलानारायण मंदिर में महिलाओं द्वारा भगवान् नारायण के शृंगार की परम्परा शुरू हुई। आज भी इस परम्परा का निर्वहन पुरे विधि विधान से करते हुए महिला पुजारी डेढ़ महीने तक भिन्न -भिन्न प्रकार के फूलों से भगवान् नारायण का शृंगार करती है।

फ्यूंलानारायण मंदिर कैसे पहुंचे –

उत्तराखंड के इस अनोखे मंदिर में जाने के लिए आपको सर्वप्रथम ऋषिकेश पहुंचना होगा। ऋषिकेश से बद्रीनाथ राष्ट्रिय राजमार्ग पर जोशीमठ से लगभग 12 किलोमीटर पहले हेलंग से उर्गम घाटी के लिए अलग सड़क जाती है ,इस सड़क पर लगभग बारह किलोमीटर की दुरी तय करने के बाद आता है कल्पनाथ मंदिर। और कल्पनाथ से करीब करीब 4 किलोमीटर की दूरी तय करने के पश्च्यात आता है भगवान्  का यह खास मंदिर फ्यूंलानारायण मंदिर।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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