Home कुछ खास गाती धोती गढ़वाल की मातृशक्ति को एक नई पहचान देती है।

गाती धोती गढ़वाल की मातृशक्ति को एक नई पहचान देती है।

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गाती धोती :-

गाती धोती गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के परिधान का एक परम उपयोगी अंगवस्त्र होता है, जो मोटी ऊनी चादर के रूप में होता था। इसके आधे भाग को कमर के नीचे पैरों तक एक विशेष ढंग से लपेट कर तथा शेष भाग को ऊपर कंधे तक ले जाकर एक विशेष तरीके की गांठ के रूप में बांधा जाता था। उसे कन्धे पर रोके रखने के लिए लोहे या लकड़ी के सुए या आलपिन का भी उपयोग किया जाता था।

इस पर शरीर को चादर से पूरा ढक लेने के बाद कमर पर ऊपर के कपड़े या एक पट्टू (कमरबन्ध) बांधा जाता था। पट्टू से इसे कमर पर बांध दिये जाने के बाद उसके ऊपर वाला भाग झोली, खुले थैला जैसा बन जाने के कारण उसमें आसानी से छोटा-मोटा सामान भी रखा जा सकता था और आवश्यकता पड़ने परलोग रखते भी थे।

इस प्रकार शरीरावरक, बिस्तर, वर्षा और तूफान में शरीर की रक्षा करने के लिए आवरक (छतरी, रेनकोट) जैसे सभी कार्यों के लिए उपयोगी होती है तथा भोजनादि वस्तुओं को साथ ले जाने के लिए ‘हौलडौल’ का भी काम करती है। अब इसका प्रचलन लगभग समाप्त हो गया है। गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के अतिरिक्त कुमाऊं के जनजातीय क्षेत्रों दारमा, व्यांस, जोहार केकई स्थानों पर महिलाएं भी गाती पहना करती थीं।

गाती धोती गढ़वाल की मातृशक्ति को एक नई पहचान देती है।

महिलाओं के अतिरिक्त पुरुष भी गाती धोती पहनते थे, किन्तु उनके पहनने का ढंग महिलाओं से कुछ भिन्न प्रकार का होता था। वे इसके नीचे भाग को घुटनों से उलट कर कमर में बांध लिया करते थे। गाती की चादर प्रायेण काले रंग की हुआ करती थी और लोग इसे स्वयं अपने घरों में तैयार करते थे।

इधर गाती का प्रचलन प्रायः समाप्त सा हो जाने से इसका स्थान अन्य ऊनी वस्त्र लेने लगे हैं। कमर को बांधे रखने एवं शरीर को ठंड से बचाये रखने के लिए कुछ वृद्ध लोग अभी भी इसका प्रयोग कर लिया करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ गरीब तबके के लोग जिन्हें खस/खसिया कहा जाता था भांग के रेशे से बनी गाती भी पहनते थे।

 पारम्परिक गाती अब गाती धोती बन गई है –

पहले गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों में पहने जाने वाला गाती वस्त्र अब लगभग विलुप्तप्राय है। अब पहाड़ो में गाती वस्त्र की स्टाइल में साड़ी और गाती धोती पहनने का चलन है। वर्तमान में गढ़वाल की मातृशक्ति धोती को गाती वस्त्र की तरह पहनती है। गढ़वाल का यह पारम्परिक वस्त्र गढ़वाल की मातृशक्ति को एक अलग पहचान दिलाता है। गढ़वाल के अलावा  पहाड़ के अन्य क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग होता है।

जैसे कुमाऊँ के कुछ क्षेत्रों में धोती को कमर के नीचे इस तरीके से बांधा जाता है कि उसमे बहुत सारी घास आ जाये। कुमाऊँ के क्षेत्रों में घास काट कर एकत्र करने के लिए अंगवस्त्र धोती को थैले की स्टाइल में बांधना गाती लगाना कहते हैं।

संदर्भ – प्रो dd शर्मा उत्तराखंड ज्ञानकोष। 

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घंटाकर्ण देवता ,भगवान विष्णु के भांजे और बद्रीनाथ के क्षेत्रपाल।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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