Sunday, April 21, 2024
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कुमाऊं के शक्तिशाली लोक देवता भोलनाथ, जिन्होंने अल्मोड़ा को जल संकट से उबारा

सैम देवता और हरु देवता  के समान ही यह भोलनाथ भी कुमाऊं के एक अति लोकप्रिय सम्मानित देवता है। इन्हे  भोलेनाथ (शिव) का अवतार माना जाता है। तथा सभी खुशी के अवसरों पर तथा प्रमुख पर्वो पर इसका स्मरण किया जाता है तथा ‘रोट’ का प्रसाद बनाकर इसका पूजन किया जाता है। कहीं-कहीं इसे भैरव के नाम से भी पूजा जाता है। इसके अतिरिक्त इनका  ‘जागर’ भी लगता है जिसे ‘भ्वलनाथ ज्यूक जागर’ कहा जाता है। इनका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः अल्मोड़ा तक ही सिमित है।

लोक देवता भोलनाथ की कहानी –

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एक लोकश्रुति के अनुसार राजा उदयचंद की दो रानियां थी। और दोनों के ही एक-एक पुत्र थे। इनमें से बड़े का नाम हरिश्चन्द्र और छोटे का ज्ञानचन्द था। कहा जाता है कि उसका छोटा भाई  ज्ञानचन्द बड़ा धूर्त, छली और कपटी था। कई लोग कहते हैं कि राजा का बड़ा बेटा बुरी संगत में पड़ने के कारण घर से निकाल दिया गया। ( कुमाऊं का इतिहास ) और कई लोगो मानना  है कि ज्ञानचंद का छल और कपट से राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी अपने इस बड़े भाई को राज्यभ्रष्ट कर डाला था। अपने भाई के इस प्रकार के षडयंत्रों से दुखी होकर  हरिश्चंद्र ने राजपाट को छोड़कर सन्यास ले लिया था। और नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ जी से शिक्षा-दीक्षा लेकर  भोलानाथ के नाम से जाना जाने लगा। कहते हैं एक स्त्री से उनका प्रेम था, जो कि उनके साधु बनने पर स्वयं भी साध्वी बन गयी थी। और उसके साथ तीर्थाटन को निकल गयी थी। उसे कई बर्मी  बामणि के नाम से संबोधित करते हैं। एक बार जब ये जब ये दोनों एक बार घूमते-घूमते आकर अल्मोड़ा के निकटस्थ एक गांव नैल पोखरी में रुके हुए हुए थे, तो उनके कपटी भाई ज्ञानचन्द को इसका पता चल गया।

कुमाऊं के शक्तिशाली लोक देवता भोलनाथ

उसको आशंका हुई कि भोलानाथ कहीं आकर अपने राज्याधिकार की मांग न कर बैठे। इसलिए उसने अपने रास्ते के इस कांटे को सदा के लिए समाप्त कर देने के लिए  एक माली को धन दिया। उस माली ने  उन दोनों को वहीँ  शीतलादेवी के मंदिर के पास में उनके आश्रम में ही मरवा डाला। कहा जाता है कि उस समय उसकी प्रेमिका गर्भवती थी। फलत: इस छलपूर्ण क्रूर हत्या के उपरान्त वे तीनों प्रेतात्माएं (भोलनाथ , बर्मी , नवजात बच्चा) बाड़ियों तथा ज्ञानचन्द को सताने लगी। राजा ज्ञानचन्द के द्वारा पुरोहितों के कहने पर इन तीनों की आत्माओं की सन्तुष्टि के लिए अल्मोड़ा नगर में अष्टभैरवों-कालभैरव, बटुक भैरव, बाल भैरव, शै भैरव, गढ़ी भैरव, आनन्द भैरव, गौर भैरव, खुटकनियां भैरव-, की स्थापना करवाई थी।

कुमाऊं के लोक देवता भोलनाथ से जुडी दूसरी कहानी –

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भोलेनाथ के कोप से बचने के लिए ज्ञानचन्द द्वारा स्थापित अल्मोड़ा के  इन भैरव मंदिरों के सम्बन्ध में एक लोकगाथा  यह भी है कि भोलानाथ पराशक्तियों से सम्पन्न घुमक्कड़ प्रकृति के संत थे। या वो एक सिद्ध पुरुष थे। एक दिन जब वह अल्मोड़ा पहुँचे तो रात्रि को अपनी पराशक्ति के बल से राजा के उस शयनकक्ष में प्रवेश कर गए जो कि सभी ओर से बंद था। जब राजा की नींद खुली तो वह वहां एक अनजान व्यक्ति को देखकर चौक गया और उसे आश्चर्य हुवा कि जब शयनकक्ष की सभी खिड़किंया, दरवाजे बंद हैं तो यह व्यक्ति कैसे अन्दर आ गया?

उसने क्रोध में आकर पास में रखे तलवार से उसका सिर काट डाला परउसका आश्चर्य और भी बढ़ गया जब उसने देखा कि उसमें से एक बूंद रक्त नहीं गिरा। इसके बाद वह जब भी पलंग पर सोता तो पलंग उलट जाता और वह भूमि पर गिर जाता। तब पुरोहितों  की सलाह पर उसने इस पवित्रात्मा की हत्या के प्रायश्चित के लिए अल्मोड़ा के इन आठों भैरव मंदिरों की स्थापना की थी।

इन्हे भी पढ़े: कुमाऊं के लोकदेवता गांगनाथ देवता की कहानी

भ्वलनाथ को समर्पित मंदिर पलटन बाजार सिद्ध नौले के पास है बाकी इन्हें मानने वाले लोग अपने घरों में ही इसकी स्थापना करके इसकी पूजा आराधना किया करते हैं और जागर लगाकर उसका अवतरण कराते हैं। इनकी हत्या पौष माह के रविवार के दिन हुई थी, इसलिए श्रद्धालु पौष के रविवारों को रोट भेंट चढ़ाते हैं।

भोलनाथ का सिद्ध नौला
सिद्ध नौला अल्मोड़ा

अल्मोड़ा का सिद्ध नौला इनकी प्रचंड शक्ति का प्रमाण –

जनश्रुतियों के अनुसार अल्मोड़ा के पलटन बाजार में स्थित सिद्ध नौला इनकी प्रचंड शक्ति का प्रमाण है। कहते हैं भोलनाथ बाबा ने यहाँ पर अपने चिमटे के वार से जलधारा को प्रस्फुटित किया था। स्थानीय लोग चिमटे के निशान की पुष्टि भी करते हैं। बाद में इसे चंद राजाओं ने एक नौले का स्वरूप दिया । इसके  बगल से एक सुरंग भी बनी है, जिसे अब  बन्द कर दिया गया है। कहते हैं भोलनाथ जी ने अल्मोड़ा में जगह – जगह अपने तपोबल से धाराएं प्रस्फुटित कर अल्मोड़ा को जल संकट से उबारा था।

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
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