डमा डमा डमरू बाजण लेगे वायरल पहाड़ी भजन लिरिक्स – इंस्टाग्राम पर वायरल पहाड़ी भजन “माता पार्वती गौरा नाचण लेगे” के पूरे लिरिक्स के साथ जानें इस मधुर भजन की विशेषताएं वायरल हुआ यह मधुर पहाड़ी भजन – आजकल सोशल मीडिया पर एक खास पहाड़ी भजन तेजी से वायरल हो रहा है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर दो प्यारी बच्चियों का “माता पार्वती गौरा नाचण लेगे”( mata parvati gora nachan lage lyrics ) गाने का क्यूट अंदाज लोगों के दिलों को छू रहा है। यह भजन मिलियन व्यूज पार करते जा रहा है और नवरात्रि 2025 के शुभ अवसर पर इसकी…
Author: Bikram Singh Bhandari
गोलू देवता मंदिर -उत्तराखंड की धरती देवभूमि कहलाती है, जहाँ हर गाँव, हर घाटी में किसी न किसी लोकदेवता की अनूठी आस्था जुड़ी हुई है। इन्हीं लोकदेवताओं में से एक हैं गोलू देवता जिन्हें न्याय का देवता भी कहा जाता है। कुमाऊँ क्षेत्र में गोलू देवता की पूजा विशेष श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाती है। भक्त अपनी मनोकामनाएँ यहाँ लिखित अर्जी के रूप में प्रस्तुत करते हैं और जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है तो वे घंटियाँ, नारियल या अन्य भेंट चढ़ाते हैं। आइए जानते हैं उत्तराखंड के पाँच प्रमुख गोलू देवता मंदिरों के बारे में, जहाँ…
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए चल रहे आंदोलन को खटीमा गोलीकांड और मसूरी गोली कांड ने एक नई दिशा दी। इन दोनों घटनाओं के बाद राज्य आंदोलन एकदम उग्र हो गया। मसूरी गोली कांड : 02 सितम्बर 1994 मसूरी के गढ़वाल टेरेस से आंदोलनकारी उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के ऑफिस की ओर बढ़ रहे थे। तभी गनहिल पहाड़ी से पत्थरबाजी हुई। कहा जाता है कि यह पथराव समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया। पथराव की आड़ में उत्तर प्रदेश की पी.ए.सी. ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां चला दीं। इस मसूरी गोलीकांड में 06 आंदोलनकारी शहीद हुए, जिनमें…
परिचय – 1994 का साल, सितम्बर महीने की पहली सुबह… ये वही दिन था जिसने उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक काला अध्याय लिख दिया – खटीमा गोलीकांड। इस दिन शांति से निकाले गए एक जुलूस को प्रशासन ने जिस बर्बरता से कुचला, उसने पूरे पहाड़ को झकझोर कर रख दिया। खटीमा गोलीकांड : 1 सितम्बर 1994 की सच्चाई जुलूस और माहौल जगह: खटीमा, उधम सिंह नगर (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) उद्देश्य: सरकार की गुंडागर्दी के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन सहभागी: पूर्व सैनिक, छात्र, महिलाएं और बच्चे – कुल लगभग 10,000 लोग जुलूस का पहला चक्कर थाने के सामने से निकल…
प्रस्तावना हिरन -चित्तल नृत्य, जिसे हरिण-चित्तल उत्सव भी कहा जाता है, कुमाऊं की जीवंत लोक-सांस्कृतिक पहचान है। ‘हरिण-चित्तल’ का अर्थ ‘चितकबरा हिरण’ है—इसी भाव के साथ कलाकार एक जीवंत अष्टपदी हिरण का रूप धरकर दर्शकों के बीच वन्यजीवन की सौम्यता, चंचलता और चपलता को नृत्य-आभिनय के माध्यम से साकार करते हैं। यह उत्सव मुख्यतः पिथौरागढ़ जनपद के सीरा परगने की अस्कोट पट्टी में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (आठू) के आसपास, विशेष रूप से गमरा महोत्सव के अवसर पर आयोजित होता है। इसे आठों मेला का हिरन चित्तल नृत्य भी कहते हैं। हिरन -चित्तल नृत्य का सांस्कृतिक महत्व…
हिलजात्रा 2025 में मुख्य रूप से 05 सितंबर 2025 को कुमौड़ गांव में मनाया जायेगा । परिचय : हिलजात्रा उत्सव उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले का प्रमुख उत्सव है। यह सोरघाटी में विशेषतः बजेटी, कुमोड़, बराल गावं, थरकोट, बलकोट, चमाली, पुरान, देवथल, सेरी, रसैपाटा में मनाया जाने वाला लोकनृत्य है। और कुछ परिवर्तनों के साथ हरिण चित्तल नृत्य के रूप में अस्कोट और कनालीछीना में मनाया जाता है। यह लोकनृत्य कृषि व्यवसाय से संबंधित होने के कारण इसमें अभिनय करने वालों का रूप भी उसी के अनुसार होता है। अर्थात इसमें कोई हल जोतते हुए बैल बनता है…
उत्तराखंड की संस्कृति लोक पर्वों और परंपराओं से भरी हुई है। इन्हीं पर्वों में सातों आठों (Satu Aathu Festival) का विशेष महत्व है। यह पर्व भाद्रपद मास की सप्तमी और अष्टमी को मनाया जाता है। इस त्योहार की खास बात यह है कि इसमें भगवान शिव को भिनज्यू (जीजाजी) और माता पार्वती को दीदी के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व मुख्यतः कुमाऊं के पिथौरागढ़ और कुमाऊं के सीमांत क्षेत्रों में मनाया जाता हैं। सातों आठों पर्व की विशेषता सातों आठों का अर्थ है – सप्तमी (सातू) और अष्टमी (आठू)। मान्यता है कि जब माता पार्वती (दीदी गवरा) भगवान्…
परिचय : उत्तराखंड के दोनों मंडलों (कुमाऊं और गढ़वाल) में पूज्य देवी है नंदा। उत्तराखंड वासियों का माँ नंदा के साथ ऐसा रिश्ता है, शायद देश में किसी भक्त और उसके आराध्य का हो। कोई इन्हे अपनी बेटी मानता है, कोई बहिन! मानवीय रिश्तों में बांध कर देवी माँ को प्रेम और स्नेह के बंधन में बांधना भक्ति का एक अलग ही रूप है। यह देवी कत्यूर पंवार और चांद वंशों की कुलदेवी के रूप में पूजित है। नंदा देवी की कहानी वीडियो में देखिए यहां : https://youtu.be/SyrEFLe5LG4 कत्यूरी वंश की सभी शाखाओं में जिया रानी को नंदा देवी का…
घी संक्रांति की शुभकामनाएँ : घी संक्रांति, जिसे ‘घी त्यार’ भी कहा जाता है, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक विशेष पर्व है। यह त्यौहार खासतौर पर कृषक-पशुपालक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन की खासियत है कि माताएं अपने बच्चों के सिर पर ताजा घी मलती हैं, साथ ही उनके स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दिन का भोजन भी घी से भरपूर होता है, जिसमें खासतौर पर बेड़ुवा रोटी बनाई जाती है। घी संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व : घी संक्रांति का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। माना जाता…
परिचय: “होठों में मुरुली” एक प्रसिद्ध कुमाऊंनी भजन है जिसे कुमाऊं के प्रसिद्ध लोकगायक स्वर्गीय पप्पू कार्की ने लिखा और गाया है। इस भजन में भगवान श्री कृष्ण की दिव्य सुंदरता, मुरली (बांसुरी) की धुन और उनके अद्भुत प्रेम का सजीव चित्रण किया गया है। कुमाऊंनी भजन के रूप में प्रस्तुत किया गया यह गीत न केवल कृष्ण भक्ति का प्रतीक है, बल्कि कुमाऊं के लोक संगीत का भी एक अद्भुत उदाहरण है। यह भजन ( hontho me muruli ) उत्तराखंड में जन्माष्टमी पर खूब पसंद किया जाता है। स्वर्गीय पप्पू कार्की जी की आवाज़ और उनके द्वारा प्रस्तुत किया…