देहरादून: उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली आशा कार्यकर्ताओं और फैसिलिटेटरों ने अपनी उपेक्षा के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले ‘आशा फैसिलिटेटर एवं कार्यकर्ता संगठन’ ने अपनी लंबित मांगों को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन सौंपा। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी कार्यालय पर जोरदार धरना-प्रदर्शन किया और उत्तराखंड सरकार को चेताया कि यदि उनकी मांगें जल्द पूरी नहीं हुईं, तो आंदोलन और उग्र होगा।
जन-स्वास्थ्य में अहम भूमिका, फिर भी उपेक्षा
संगठन ने ज्ञापन में स्पष्ट किया कि आशा फैसिलिटेटर वर्ष 2005 से राज्य स्वास्थ्य विभाग के तहत अपनी सेवाएं दे रही हैं। वर्तमान में उत्तराखंड की 12,315 आशा कार्यकर्ताओं का कुशल मार्गदर्शन 606 आशा फैसिलिटेटरों द्वारा किया जा रहा है।
चाहे टीकाकरण अभियान हो, प्रसव संबंधी जागरूकता या केंद्र व राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं को घर-घर पहुँचाना—इन कार्यकर्ताओं की भूमिका अग्रणी रहती है। इसके बावजूद, उन्हें उचित मानदेय और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
“उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाएं भारी महंगाई के बीच काम कर रही हैं। लंबे समय से हम अपनी जायज मांगों के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।”
— रेनू नेगी, महामंत्री (प्रदेश संघ) एवं उपाध्यक्ष (अखिल भारतीय आशा कर्मचारी संघ)
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ये हैं प्रमुख 9 सूत्रीय मांगें:
आशा फैसिलिटेटरों ने शासन-प्रशासन के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
- निश्चित मानदेय: 25 दिन की मोबिलिटी के बजाय 30 दिन का निश्चित मानदेय दिया जाए।
- भत्ता सुविधा: स्टेशनरी और यात्रा भत्ता (Travel Allowance) लागू हो।
- विसंगति दूर करना: आशा बहनों की वृद्धि के सापेक्ष फैसिलिटेटरों के भत्तों में कटौती बंद की जाए।
- बैठक मानदेय में वृद्धि: PLA, VHSNC और महिला आरोग्य समिति की बैठक का मानदेय ₹100 से बढ़ाकर ₹800 किया जाए, क्योंकि दुर्गम क्षेत्रों में उन्हें निजी वाहनों से जाना पड़ता है।
- सामाजिक सुरक्षा: फैसिलिटेटरों को सामाजिक सुरक्षा नियमावली के दायरे में लाया जाए।
- वर्दी की सुविधा: सर्दी और गर्मी के मौसम के अनुसार अलग-अलग वर्दी दी जाए।
- अवकाश: राज्य कर्मचारियों की तर्ज पर सवैतनिक अवकाश की सुविधा मिले।
- पल्स पोलियो भत्ता: ड्यूटी का मानदेय ₹100 प्रतिदिन से बढ़ाकर ₹600 किया जाए।
- बीमा सुरक्षा: ड्यूटी के दौरान दुर्घटना या मृत्यु होने पर ₹10 लाख के मुआवजे का प्रावधान हो।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे स्वास्थ्य विभाग के हर छोटे-बड़े लक्ष्य को पूरा करने में जी-जान लगा देती हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल आश्वासन मिलते हैं। भारतीय मजदूर संघ के नेतृत्व में अब यह लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है।
