Monday, March 4, 2024
Homeसंस्कृतिउत्तराखंड की लोककथाएँऐड़ी देवता या ऐरी देवता की कहानी | Aidi devta devta Story...

ऐड़ी देवता या ऐरी देवता की कहानी | Aidi devta devta Story in hindi

उत्तराखंड के लोक देवता ऐरी देवता की कहानी।

ऐड़ी देवता उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र के लोक देवता हैं। उन्हें वन देवता के रूप में पूजा जाता है। कहते हैं कि ऐड़ी देवता अपने क्षेत्र में रात्रि को ,अपने दल बल के साथ शिकार के लिए निकलते हैं।और रात्रि में बुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में ऐरी देवता के बारे में अनेक कथाएं एवं मान्यताएं प्रचलित हैं। और चंपावत और नैनीताल जिले के बीच मे ब्यानधुरा नामक स्थान पर ,ऐड़ी देवता का प्रसिद्ध मंदिर है।

यह एक अनोखा मंदिर है, जहां लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर धनुष बाण चढ़ावे में चढ़ाते हैं। इसीलिए  यह मंदिर को धनुष चढ़ाने वाला मंदिर भी कहते हैं। भगवान शिव के 108 ज्योतिर्लिंगों में से एक मान्यता प्राप्त ज्योतिर्लिंग यहाँ है । इसीलिए इस मंदिर को देवताओं की विधानसभा भी कहते हैं। कहते हैं कि कुमाऊँ में एक राजा ऐड़ी हुवा करते थे। उन्होंने ब्यानधुरा की चोटी पर ,तपस्या करके देवत्व प्राप्त किया ,और कालांतर में ऐरी देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

अन्य कथाओं के अनुसार ऐरी देवता ,आखेट प्रिय, अल्हड़ और क्रोधी स्वभाव के देवता हैं, रात को डोली में बैठ कर पहाड़ो, और जंगलों की यात्रा करते हैं। इनके साथ जो दल चलता है,वो बहुत खतरनाक बताया जाता है। ऐड़ी देवता के बारे में एक कुमाउनी लोक कथा में बताया जाता है,कि मानव रुप में इनका नाम त्यूना था।इनके साथ दो कुत्ते होते थे, झपूवा और कठुआ । इन कुत्तों के साथ ऐरी जंगल मे शिकार खेलता था। एक दिन शिकार खेलने में दुर्धटना वश इनके पैर टूट गए। और इनकी मृत्यु हो गई। कहते हैं ,इसी लिए ऐरी प्रेत योनि में डोली बैठ कर शिकार खेलते हैं।

ऐड़ी देवता के बारे में कुमाऊँ के इतिहास में –

कुमाऊँ का इतिहास किताब के रचयिता एवं उत्तराखंड के प्रमुख इतिहासकार श्री बद्रीदत्त पांडे जी ने ऐरी देवता के बारे में कुछ इस प्रकार वर्णन किया है।

Best Taxi Services in haldwani

ऐरी या ऐड़ी कुमाउनी राजपूतों की प्रसिद्ध जाती है। इस जाति में एक वीर बलवान पुरुष पैदा हुआ था। उसे शिकार खेलने का बहुत शौक था। उसकी जब मृत्यु हुई तो वह प्रेत योनि में भटकने लगा। बच्चो और औरतों को सताने लगा, जब जागर लगाई,तो उसने बताया कि वह ऐड़ी है,उसकी हलवा पूरी बकरा आदि चढ़ा कर उसकी पूजा करो। वह सबको छोड़ देगा,सबका भला करेगा।

लोकमतों एवं लोककथाओं के अनुसार, एड़ी डोली में बैठ कर बड़े बड़े पहाड़ो व जंगलों में शिकार खेलता है। ऐड़ी की डोली ले जाने वाले को साऊ भाऊ कहते हैं। कहते हैं,जो रात को ऐरी देवता के कुत्तों की आवाज सुन लेता है,वो अवश्य कष्ट पाता है। ऐरी देवता के साथ ये कुत्ते हमेशा रहते हैं। शिकार में मदद करने और जानवरों को घेरने के लिए ऐरी के साथ भूतों की टोली भी चलती है,जिनको बया बाण बोलते हैं। और साथ मे खतरनाक आँचरी कींचरी नामक खतरनाक परिया भी चलती हैं। इनके पैर पीछे की तरफ टेढ़े होते हैं। ऐड़ी देवता का हथियार तीर कमान होता है। जब कभी जंगल मे बिना झखम का कोई जानवर मरा मिलता है, तो उसे ऐड़ी का मारा हुवा मान लिया जाता है।

और कहा जाता है,कि कभी कभी,ऐड़ी देवता का चलाया हुवा तीर , मकान के जाले (  धुवा निकलने के लिए चिमनी या,हवा पास होने के लिए जो छेद बना होता है ) से होकर अंदर आ जाता है, और जिसको यह तीर लगता है, वो अपंग हो जाता है। एक कहावत भी कही जाती है,कुमाउनी में – “डाल मुड़ी से जाण, जाल मुड़ी नी सेतण”  पेड़ के नीचे सो जाओ, लेकिन आले के निचे नही सोना चाहिए।

इसे भी पढ़े – क्यों कहते हैं,लोक पर्व बिखोति को बूढ़ त्यार ?

एड़ी देवता की सवारी कभी कभी लोग देख भी लेते हैं-

कहते हैं, झिजाड़ गाव का एक किसान किसी जरूरी काम से रात को बाहर आया, अचानक कुत्तों के गले की घंटी और जानवरों को घेरने की आवाज आई, किसान समझ गया कि आस पास ऐड़ी का डोला चल रहा है। जैसे ही किसान ने डोला देखा,तो उसने पकड़ लिया । ऐड़ी ने उसे छोड़ने के लिए बहुत कहा, लेकिन उसने नही छोड़ा। तब अंत मे ऐड़ी ने वरदान मांगने को कहा, तो उसने वरदान मांगा की ऐड़ी देवता की सवारी उसके गाव में कभी न आये, ऐड़ी ने स्वीकार किया। कहाँ जाता है,यदि किसी पर ऐड़ी की नजर पड़ गई तो वो मर जाता है।अमूमन ऐसा होता नही है, क्योंकि ऐड़ी की आँखें सिर पर ऊपर की ओर बताई जाती हैं। ऐरी का थूक जिस पर पड़ता है, वह मर जाता है। ऐरी का थूक का विष बन जाता। ऐड़ी के साथ आमना सामना होने पर आदमी की मृत्यु हो जाती है,या उसके कुत्ते फाड़ देते है,और आँचरी कींचरि उस आदमी के कलेजे को चाट जाती है। अगर ऐरी को देखकर कोई बच जाए तो वो धनी हो जाता है। ऐड़ी देवता का मंदिर जंगल मे होता है।

मित्रो ये जानकारी का श्रोत श्री बद्रीदत्त पांडे जी की लिखी किताब कुमाऊं का इतिहास ( पृष्ठ 665-666)  था।

ऐड़ी देवता

ब्यानधुरा ऐड़ी जागर में ऐड़ी देवता की एक और गाथा गाई जाती है, जिसके अनुसार , –

इस कहानी के अनुसार ऐड़ी बाइस भाई थे। उन्हें बाइस भाई ऐड़ी राजा कहा जाता था। वे धनुर्विद्या में निपुण थे।  उनके धनुष से निकले  बाइस बाण ,बाइस प्रकार की व्याधियों का निवारण करने में सक्षम थे। ऐड़ी राजा न्यायप्रिय थे। एड़ी राजा कभी किसी को भूखा नहीं रहने देते थे। वर्तमान नेपाल के डोटीगढ़ में उनका राज्य था। केसिया डोटियाल ऐड़ी राजकुल का कुल पुरोहित था। वह उनके ऐशो आराम से जलने लगा था। उसने षड्यंत्र द्वारा बाइस भाई ऐड़ी राजाओं को जहर दे दिया। और षड्यंत्र से ही उन्हें अलग -अलग कमरों में बंद कर दिया। तब एक दिन जब बाइस भाई ऐड़ी निर्जीव हो गए ,तब उनकी आत्मा अपने प्रिय दासों ,धर्मदास ,बिन्निदास सहित बाइस दासों को अपनी स्थिति के बारे में बताया।

धर्मदास ने सभी बाइस दासों के साथ मिलकर ,बाइस भाई ऐड़ी राजाओं को बंद कमरों से निकाल कर अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार राजाओं की झाड़ फूक करनी शुरू की। सभी दासों की अथक मेहनत से ऐड़ी राजाओं को स्वस्थ कर दिया। स्वस्थ होने के बाद उनका मन टूट गया। बाइस भाई ऐड़ी राजपाट छोड़ कर तपस्या के लिए निकल गए।  वे काली नदी पार करके चम्पवात और नेपाल के बीच ब्यानधुरा नामक छोटी पर आए, उन्होंने यहीं तपस्या की और यहीं से देवत्व प्राप्त किया। कहाँ जाता है,कि ऐड़ी के ब्यानधुरा निवास के कारण , मुगल और पठान पहाड़ नही चढ़ पाए। कहते हैं एक बार पठान, मुगल पहाड़ों की ओर आ रहे थे। तब राजा एड़ी को पता चल गया ,उन्होंने चंपावत के राजा, गोरिया और उनके 52 वीरों की सहायता से पठानों ,मुगलों को वापस खदेड़ दिया था ।

ब्यानधुरा में ऐड़ी देवता का बहुत बड़ा मंदिर है। लोग वहां धनुष बाण चढ़ाते हैं। ऐड़ी देवता सबका कल्याण करते हैं । यहाँ की सबसे बड़ी खासियत है,कि यहां ऐड़ी देवता के आशीर्वाद से निःसंतान महिलाओं को संतान प्राप्ति होती है। लोग इन्हें धनुर्धारी अर्जुन के अवतार या अर्जुन के रूप में भी इन्हें पूजते हैं।

इसे भी पढ़े – ये पहाड़ी राज्यों में इनर लाइन परमिट क्या होता है।

अंत मे :- मित्रों उपरोक्त लेख में हमने ऐड़ी देवता के बारे में अलग अलग कहानियों और जानकारियों को एक लेख में संकलित किया है। सभी कहानी और जानकारियों से यह स्पष्ट होता है,कि ऐरी देवता कुमाऊँ मंडल के लोकदेवता हैं। इनको कुमाऊँ के अलग – अलग क्षेत्रों में अलग अलग रूप में पूजा जाता है।

इस लेख का संदर्भ लोककथाएँ और बद्रीदत्त पांडे जी की पुस्तक कुमाऊँ का इतिहास है। इस पोस्ट से संबंधित अपने कीमती विचार देने के लिए हमारे फेसबुक पेज देवभूमी दर्शन में संपर्क करें।

देवभूमी दर्शन के वाट्सप ग्रुप से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

Follow us on Google News
Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
RELATED ARTICLES
spot_img
Amazon

Most Popular

Recent Comments