शिव के मन माहि बसे काशी : फरवरी– मार्च का महीना शुरू होते ही Uttarakhand के पहाड़ों में बसंत की बयार चलने लगती है और कुमाऊनी होली की रंगत चारों ओर फैल जाती है। बसंत पंचमी से बैठक होली की शुरुआत होती है और होली एकादशी आते-आते खड़ी होली पूरे शबाब पर पहुँच जाती है।
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कुमाऊनी होली का इतिहास देखिये –
कुमाऊनी होली भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है, जहाँ लोक भाषा और ब्रज भाषा का सुंदर संगम देखने को मिलता है। इसी परंपरा में गाया जाने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय शिव भक्ति गीत है –
शिव के मन माहि बसे काशी लिरिक्स ।कुमाऊनी होली गीत
शिव के मन माही बसे काशी – (2 बार)
आधी काशी में बामन बनिया,
आधी काशी में सन्यासी,
शिव के मन माही बसे काशी
काही करन को बामन बनिया,
काही करन को सन्यासी।
शिव के मन माही बसे काशी।
पूजा करन को बामन बनिया,
सेवा करन को सन्यासी,
शिव के मन माही बसे काशी।
काही को पूजे बामन बनिया,
काही को पूजे सन्यासी।
शिव के मन माही बसे काशी।
देवी को पूजे बामन बनिया,
शिव को पूजे सन्यासी,
शिव के मन माहि बसे काशी।
क्या इच्छा पूजे बामन बनिया,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी,
शिव के मन माही बसे काशी।
नव सिद्धि पूजे बामन बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी।
शिव के मन माहि बसे काशी।
यह गीत कब और कैसे गाया जाता है?
यह कुमाऊनी होली गीत मुख्यतः बैठक होली के दौरान गाया जाता है। हारमोनियम और तबले के साथ बुजुर्ग एवं युवा मिलकर इसे संवादात्मक शैली में प्रस्तुत करते हैं। कई गाँवों में यह गीत खड़ी होली के समय भी सामूहिक रूप से गाया जाता है। इस भजननुमा होली गीत में प्रश्न-उत्तर के माध्यम से शिव भक्ति को व्यक्त किया गया है, जो श्रोताओं को भावुक कर देता है।
इस कुमाऊनी होली गीत का भावार्थ–
इस गीत में बताया गया है कि भगवान शिव के हृदय में काशी का वास है। काशी को आज Varanasi के नाम से जाना जाता है।
गीत के अनुसार —
- ब्राह्मण और बनिया पूजा करते हैं,जबकि सन्यासी सेवा और साधना में लीन रहते हैं। यह दर्शाता है कि भक्ति के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है — शिव की आराधना।
- कुमाऊनी होली में शिव भक्ति का महत्व –कुमाऊँ अंचल में होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि भक्ति और संगीत का उत्सव है। शिव से जुड़े होली गीतों में जीवन दर्शन, त्याग और साधना का भाव छिपा होता है। यही कारण है कि “शिव के मन माहि बसे काशी” जैसे गीत पीढ़ियों से गाए जा रहे हैं।
कुमाऊनी होली की विशेषताएँ–
- संस्कृति और परंपरा
- यह गीत उत्तराखंड की समृद्ध लोक विरासत को जीवंत करता है।
- भक्ति भावना
- भगवान शिव और उनकी प्रिय नगरी काशी की महिमा का वर्णन मिलता है
- संगीत और संवाद – गीत प्रश्न-उत्तर शैली में गाया जाता है, जो इसे और प्रभावशाली बनाता है।
कुमाऊनी होली गीत आज भी क्यों प्रासंगिक हैं?
डिजिटल दौर में भी कुमाऊनी होली गीत अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए हैं। गाँवों से लेकर शहरों तक लोग इन पारंपरिक गीतों को सुनना और गाना पसंद करते हैं। आज सोशल मीडिया और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर भी कुमाऊनी होली के वीडियो तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जिससे युवा पीढ़ी इन लोक परंपराओं से दोबारा जुड़ रही है। “शिव के मन माहि बसे काशी” जैसे भक्ति गीत नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और पहाड़ी संस्कृति को जीवित रखते हैं।
इन गीतों के माध्यम से केवल मनोरंजन ही नहीं होता, बल्कि जीवन दर्शन, भक्ति भावना और सामूहिक मेल-जोल का संदेश भी मिलता है। होली के समय जब गाँवों में बुजुर्ग और युवा एक साथ बैठकर या खड़े होकर ये गीत गाते हैं, तब एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण बन जाता है। यही कारण है कि कुमाऊनी होली गीत आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहे हैं और उत्तराखंड की लोक विरासत को मजबूत बनाए हुए हैं।
अगर आप भी कुमाऊनी होली के इन भक्तिमय गीतों का आनंद लेना चाहते हैं, तो इस सांस्कृतिक धरोहर को जरूर सहेजिए और अगली पीढ़ी तक पहुँचाइए।
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