कुमाऊनी होली का इतिहास : देश में ब्रज के बाद सबसे ज़्यादा होली उत्तराखंड की प्रसिद्ध मानी जाती है। बैठकी होली यानी जो होली बैठ कर गायी जाती है और खड़ी होली जोकि खड़े होकर सामूहिक नृत्य के साथ आंगनों –चौराहों में गायी जाती है।
खड़ी होली ग्रामीण अंचल की ठेठ सामूहिक अभिव्यक्ति है जबकि बैठकी होली को नगर होली भी कहा जाता है। बैठकी होली शास्त्रीय संगीत की बैठकों के तरह होते हुए भी लोकमानस से इस प्रकार जुड़ी है कि उस महफिल में बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति उसमें अपने को गायक मानता है और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती है। विभिन्न रागों से सजी होली बैठकी की इस परम्परा में अनगिनत गीत हैं जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जा रहा है।
कुमाऊँ के नेपाल सीमा से लगे लोहाघाट में खड़ी होली की धूम मची हुई है, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, हल्द्वानी में बैठकी होली का रंग चढ़ा हुआ है, जबकि नैनीताल में परंपरागत खड़ी होली का मज़ा लिया जा रहा है। भारत के होली पर्व में ब्रज की होली का जो निराला रूप है, उसमें उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की होली का स्वरूप भी कम नहीं है। कुमाऊँ अंचल की होली का स्वरूप भी कम नहीं है।
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कुमाऊनी होली का इतिहास :-
कुमाऊँ में इस उत्सव की शुरुआत कब हुई यह तय कर पाना कठिन है किंतु अनुमानतः मध्यकाल में दसवीं–ग्यारहवीं सदी से इसका प्रारंभ माना जाता है। गढ़वाल अंचल के टिहरी व श्रीनगर शहर में कुमाऊँ के लोगों की बसरात और राजदरबार के होने से होली का वर्णन मोलाराम की कविताओं में आता है। इस काल में मैदानी क्षेत्र से भिन्न-भिन्न मानव समुदायों का आगमन यहाँ हुआ, जो अपने साथ विरासत में अपनी संस्कृति भी लाये।
कहते हैं 16वीं सदी में कुमाऊँ में होली गायन की परम्परा का आरम्भ राजा कल्याण चंद के समय में हुआ। कुमाऊँ नरेश उद्योतचंद ने 1697 में ‘दशहरे का भवन’ अपने महल में बनवाया, उसमें दशहरे के दिन राजसभा होती थी। यहाँ राजाओं, कत्यूरियों, मणकोटियों, पंवार वंशीय राजाओं तथा अन्य राजघरानों के बीच आपसी सम्बन्ध कैसे रहे हों, कलाकारों का सम्बन्ध काफी घनिष्ठ रहा है। राजशाही के जमाने में कई संगीत मर्ज़ यहाँ आए और कई जिज्ञासु ज्ञान अर्जित करने के उद्देश्य से बाहर गये।
चंद राजकाल में राजा प्रद्युमन शाह ने रामपुर के दरबारी संगीतज्ञ अमानत हुसैन को अपने यहाँ बुलाया। प्रद्युम्न शाह को गोरखा आक्रमण से पूर्व सन 1778 के लगभग हरदेव जोशी ने अल्मोड़ा के राजदरबार पर बिठाया था। होली गीत से भी राजा के संगीत प्रेमी होने की पुष्टि होती है –
“तुम राजा प्रद्युम्न शाह मेरो करौ प्रतिपाल, आज होली खेल रहे, सकल सभासद खेल रहे हैं कर धर सूंदर थाल री”
कहते हैं ग्वालियर, मथुरा से भी संगीतज्ञ यहाँ आते रहे। 1850 से होली बैठकों नियमित होने लगी तथा 1870 से यह समारोह के रूप में मनाया जाने लगा। शास्त्रीय संगीत से अपनी कुमाऊँ की बैठ होली के स्वरूप को बनाने में उस्ताद अमानत हुसैन का नाम सर्वप्रथम आता है।
राजा कल्याण चंद के समय दरबारी गायकों के संकेत मिलते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि दरभंगा में शासकों से भी कहीं-कहीं सम्बन्ध रहे होंगे। कुमाऊँ और दरभंगा की होली में अनोखा सामंजस्य है। कन्नौज व रामपुर की गायकी का प्रभाव भी इसमें पड़ा। अमानत अली उस्ताद ने होली गायकी को ठुमरी रूप में सुदृढ़ बनाया। गिरिशचन्द्र उप्रेती होली गायकों का योगदान इसमें रहा है। मुगल शासक व कलाकारों की भी होली गायकी का यह शैली रिश्ता गई और वह गा उठे –
“किसी मस्त के आने की आरजू है……!”
कुमाऊँ की होली के काव्य स्वरूप को देखने से पता चलता है कि कितने विविध भाव इन रचनाओं में भरे हैं। इसी प्रकार इसका संगीत पक्ष भी शास्त्रीय और गहरा है। पौष के प्रथम रविवार से होली गायन की यहाँ जो परम्परा बन चुकी है, उसकी नींव बहुत सुदृढ़ है। पहाड़ का प्रत्येक कृषक आशु कवि है, गीत के ताजा बोल गाना और फिर उसे विस्मृत कर देना सामान्य बात थी। इसलिए होली गीतों के रचयिताओं का पता नहीं है। कतिपय विद्वानों के बारे में पता चलता है कि इन्होंने रचनाएँ रची हैं।
कुमाऊनी खड़ी होली की परम्परा
खड़ी होली का अभ्यास आमतौर पर गांव के मुखिया के आंगन में होता है। यह होली अर्ध-शास्त्रीय परंपरा में गाई जाती है जहां मुख्य होल्यार होली के मुखड़े को गाते हैं और बाकी होल्यार उसके चारों ओर एक वृत्त घेरे में उस मुखड़े को दोहराते हैं। ढोल नगाड़ों समेत संगीत देते हैं, घेरे में कदमों को मिलाकर नृत्य भी चलता रहता है। कुल मिलाकर यह एक अलग और स्थानीय शैली है, जिसकी लय अलग-अलग घाटियों में अपनी अलग विशेषता और विशिष्टता लिए हुए खड़ी होली ही सही मायनों में गांव की संस्कृति की प्रतीक है।
यह आमतौर पर एकादशी के दिन प्रधान के आंगन में अथवा मंदिर में चीर बंधन के साथ प्रारंभ होती है। द्वादशी और त्रयोदशी को यह होली अपने गांव के निशान अर्थात विजय ध्वज, ढोल नगाड़े और नरसिंग जैसे वाद्य यंत्रों के साथ गांव के हर मकान के आंगन में होली का गीत गाने पहुंचकर शुभ आशीष देती है। उस घर का स्वामी अपनी श्रद्धा और हैसियत के अनुसार होली में सभी गांव वालों का गुड़, आलू और अन्य मिठान के साथ स्वागत करता है।
चतुर्दशी के दिन क्षेत्र के मंदिर में होली पहुंचती है, खेली जाती है। चतुर्दशी और पूर्णिमा के संधिकाल में मैदानी इलाकों में होलिका दहन होता है जबकि यहां कुमाऊं अंचल के गांवों में गांव के सार्वजनिक स्थान में होली दहन होता है। अगले दिन छलड़ी यानी गिले रंगों और पानी की होली के साथ होली संपन्न होती है।
कुमाऊनी महिला होली और स्वांग–ठेठर की परम्परा
कुमाऊनी महिला होली बसंत पंचमी के दिन से प्रारंभ होकर रंग के दूसरे दिन टीके तक प्रचलित रहती है। यह आमतौर पर बैठकर ही होती है। ढोलक और मंजीरा इसके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं। महिलाओं की होली शास्त्रीय, स्थानीय और फिल्मी गानों को समेट कर उनके प्रयोग से लगातार नया स्वरूप प्राप्त करती रहती है।
25–30 वर्ष पूर्व जब समाज में होली के प्रति पुरुषों का आकर्षण कम हो रहा था और तमाम मैदानी क्षेत्र की नशे की बुराइयाँ पर्वतीय होली में शामिल हो रही थीं, तब महिलाओं ने इस सांस्कृतिक त्यौहार को केवल बचाया ही नहीं, आगे भी बढ़ाया। स्वांग और ठेठर होली में मनोरंजन की सहायक विधा है, इसके बिना होली अधूरी है।
यह विधा खासतौर पर महिलाओं की बैठकी होली में ज्यादा प्रचलित है, जिसमें समाज के अलग-अलग किरदारों और उनके संदेश को अपनी जोकरनुमा पोशाक और प्रभावशाली व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। संगीत के मध्य विराम के समय यह स्वांग और ठेठर होली को अलग ऊंचाई प्रदान करता है। कालांतर में होली के स्वांग और ठेठर होली की विधा ने कुछ बड़े कलाकारों को भी जन्म दिया।
यूँ तो कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में होली का त्यौहार बढ़-चढ़कर परंपरागत रूप से ही मनाया जाता है, लेकिन मुख्य रूप से अल्मोड़ा, द्वाराहाट, बागेश्वर, गोलिकोट, पिथौरागढ़, पाटी, चंपावत, नैनीताल कुमाऊं की संस्कृति के केंद्र हैं। यहां के सामाजिक ताने-बाने में वह तत्व मौजूद हैं जो संस्कृति और उसके महत्व को समझते हैं। वह जनता है कि संस्कृति ही समाज को स्थायी रूप से समृद्ध करती है।
निष्कर्ष
कुमाऊनी होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि संगीत, साहित्य, सामूहिकता और सामाजिक चेतना का जीवंत संगम है। बैठकी होली की शास्त्रीय गरिमा हो या खड़ी होली की लोक ऊर्जा — दोनों मिलकर कुमाऊँ की पहचान रचती हैं। यही कारण है कि आज कुमाऊनी होली विश्व प्रसिद्ध सांस्कृतिक परम्परा के रूप में पहचानी जाती है।
संदर्भ :
- उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक
- https://panchjanya.com
- कुमाऊं का त्यौहार और परम्पराएं
- कुमाऊं का इतिहास
- विकिपीडिआ
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