Home संस्कृति गोल्ज्यू से शुरू हुई लगती है कुमाऊं की ये प्यारी परम्परा।

गोल्ज्यू से शुरू हुई लगती है कुमाऊं की ये प्यारी परम्परा।

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कुमाऊं की परम्परा
कुमाऊं की प्रचलित परम्परा

उत्तराखंड की संस्कृति, परम्पराओं में आपसी प्रेम, प्रकृति प्रेम, मानव कल्याण की भावनाये कूट-कूट कर भरी होती है। इसी फेरहिस्त में कुमाऊं उत्तराखंड की एक प्यारी परम्परा है ,जिसमे भांजे और भांजी को परिवार या समाज का सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है। भांजे -भांजी को दक्षिणा देना, दान करना पुण्य माना जाता है। कुमाऊं मंडल में हर शुभ कार्यों में भांजे भांजी को पुरोहित के साथ लगभग उनके बराबर दान-दक्षिणा से सम्मानित किया जाता है। भांजे – भांजी को कुमाऊं में ब्राह्मण माना जाता हैं। बिना भांजे के कोई शुभ काम सफल नहीं होता है।

कुमाऊं की ये प्यारी परम्परा कब से शुरू हुई ,और किसने शुरू की पता नहीं , किन्तु बड़े बूढ़े बताते है  इस परम्परा का अनुपालन सबसे पहले कुमाऊं के बहुपूजित प्रिय लोकदेवता गोल्ज्यू से हुवा है। उन्ही से मामा -भांजे के प्यार को मजबूत करने वाली यह परंपरा चल पड़ी। जैसे गोल्ज्यू की कहानी से हमे पता है कि गोल्ज्यू पंचनाम देवताओं के भांजे थे। उनकी माँ कालिंका पंचनाम देवताओं की प्यारी बहिन थी। कुमाऊं में देवताओं से जुड़े कोई भी कार्यक्रम में सबसे पहले गोल्ज्यू की पूजा होती है। सबसे पहले गोल्ज्यू की गद्दी लगाई जाती है। जागर में भी सबसे पहले गोल्ज्यू को आमंत्रित किया जाता है।

गोल्ज्यू को सब देवताओं में अगवानी देव माना जाता है। अर्थात किसी भी शुभकार्य में पहले पूजित ,पहले पहल करने वाले देव माना जाता है। बाकी देवताओं के किसी भी निर्णय में गोल्ज्यू की राय सर्वोच्च रहती है ,उनका निर्णय सर्वमान्य होता है । या यूँ कह लीजिये देवताओं ने अपने प्रिय भांजे को आगे से नेतृत्व करने के पूरे अधिकार दे रखे हैं। मामा -भांजे का ये प्यार एकतरफा नहीं होता ,गोल्ज्यू भी अपने मामाओं को पूरा प्यार और सम्मान देते हुए , जै मामू ” के उद्घोष से अपने मामाओं की जय जयकार करते हैं। उन्हें पूरा प्यार और सम्मान देते हैं।

अपने प्रिय देवता द्वारा निभाई परम्परा को कुमाऊं के निवासी आज भी अपने भांजे -भांजी को सम्मानित कर शुभकार्यों में उन्हें  ,सम्मानित स्थान देकर निभा रहे हैं।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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