Kalika mata mandir uttarakhand : कालिंका मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के बिरोनखाल ब्लॉक में स्थित कालिंका मंदिर का पहाड़ी मंदिर गढ़वाल–कुमाऊँ सीमांत संस्कृति, लोकआस्था और इतिहास का एक अनोखा संगम है। समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर अल्मोड़ा जिले की सीमा के बिल्कुल निकट आता है और देवी काली को समर्पित है।
कालिंका मंदिर सदियों से अस्तित्व में रहा है, हालांकि पिछले दशक में इसकी संरचना को दो बार नए स्वरूप में पुनर्निर्मित किया गया। कई बार इसे बूंखाल कालिंका से भ्रमित किया जाता है, जो थलीसैंण क्षेत्र के मलुंड गाँव के पास स्थित है, जबकि दोनों का इतिहास, भूगोल और सामाजिक संदर्भ अलग हैं। कालिंका डांडा और उससे जुड़ा मेला न केवल धार्मिक परंपरा, बल्कि सामाजिक, सामरिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्त्व रखता है।
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बीरोंखाल क्षेत्र का कालिंका मंदिर, कालिंका मेला और साबलीगढ़ का इतिहास –
बीरोंखाल क्षेत्र के खाटली मल्ला में स्थित कालिंका डांडा 7500 फीट की ऊँचाई पर स्थित वह पहाड़ी है जहाँ पूष मास की अष्टमी को सदियों से विशाल मेला लगता आ रहा है। कुमाऊँ–गढ़वाल की सीमा पर बसे इस क्षेत्र में पहले दिन–रात का लंबा मेला आयोजित होता था। चौकोट और स्याल्दे तक के लोग 40–50 किलोमीटर पैदल चलकर यहाँ पहुँचते, मनौती माँगते और उसकी पूर्ति पर पुनः लौटकर चढ़ावा चढ़ाते। कठोर शीतकाल के बावजूद इस यात्रा की कठिनाई आस्था की तीव्रता के आगे गौण हो जाती थी।
यह मेला कभी बलि-परंपरा के कारण इतना प्रसिद्ध था कि इसे बूंखाल कालिका के मेले के बराबर और कई मायनों में उससे अधिक माना जाता था। सीमांत संघर्षों के दौर में कुमाऊँ और गढ़वाल राज्यों के तनावपूर्ण संबंध इस मेले में भी झलकते थे। पुराने किस्सों में यहाँ बलाबल, परीक्षा, चुनौती और मारकाट की घटनाएँ भी उल्लेखित मिलती हैं।
यद्यपि समय के साथ रक्त-बलि का स्वरूप बदला, लेकिन एक युग में ऐसा भी दौर रहा जब बकरों और जैते/भैंसों की बड़े पैमाने पर बलि दी जाती थी। एक पुराने विवरण में उल्लेख है कि तीन वर्ष के अंतराल पर लगने वाले कालिंका मेला में एक ही अवसर पर लगभग ढाई हजार बकरे और पाँच सौ जैते काटे गए थे। बाद में यह प्रथा प्रतिबंधित कर दी गई और सामाजिक ढाँचा भी बदलता गया, पर मेले में शराबखोरी, गुटबाज़ी और झगड़े जैसी समस्याएँ लंबे समय तक चुनौती बनी रहीं। चारों ओर फैला घना जंगल और सीमित प्रशासनिक उपस्थिति व्यवस्था को और कठिन बना देती थी।
मेले के केंद्र में एक प्राचीन चट्टान और उसके निकट स्थित यंत्रात्मक शिला है, जिसके नीचे जत्योड़ा नामक कुंड स्थित है। परंपरागत मान्यता के अनुसार यहीं बलि के बाद जत्या (भैंसे) का रक्त संग्रहित होता था। कालिंका नाम लेते ही इस स्थल की लोककथाएँ और लोग-कहानियाँ मन में सिहरन उत्पन्न करती हैं। आज भी श्रद्धालु यहाँ छत्र, खाडू, दक्षिणा और मनौती चढ़ाते हैं।
पूजा-पद्धति में साबर तंत्र की छाप स्पष्ट दिखाई देती है और प्रसाद में जैता बाँधने वाली सीता रस्सी के टुकड़े घर ले जाने की परंपरा अब भी जीवित है। स्थानीय व्यापार भी मेले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गन्ना, अखरोट, भांग बीज, संतरा, माल्टा, डडोली, ज्योड़ा और रवड़ा जैसी ग्रामीण वस्तुएँ यहाँ बड़े पैमाने पर बिकती हैं। वर्ष 1990 में भारी बर्फबारी और वर्षा के कारण हुई दुर्घटना, जिसमें तेरह लोगों की मृत्यु और कई घायल हुए, मेले की सबसे दुखद यादों में से एक है। यह घटना स्थानीय जनमानस में देवी के कोप से भी जोड़ी जाती है।
कालिंका डांडा के नीचे स्थित साबलीगढ़ इस क्षेत्र के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह किला गढ़वाल राज्य की दक्षिण-पूर्वी सीमा की रक्षा के लिए बनाया गया था। प्रारंभिक समय में इसकी रखवाली साबली के बंगारियों को सौंपी गई थी, पर कुमाऊँ के राजा बाजबहादुर चंद ने उन्हें अपने पक्ष में कर लिया।
इसके बाद श्रीनगर नरेश ने बडियारगढ़ के वीर रावतों को यहाँ की कमान दी और कंडारी को किलेदार नियुक्त किया। संवत 1789 अर्थात 1727 ईस्वी में दीवान रघुपति ने इस किले की नींव रखी और लगभग दस वर्षों में इसे पूरा किया गया। प्रति परिवार आठ पाथा चावल और आठ पाथा रोडा के रूप में कर लिया जाता था। इस निर्माण के सरंजामकर्ता मानू थपलियाल थे, जो कुमाऊँ दरबार में गढ़वाल की ओर से प्रतिनिधि की भूमिका निभाते थे।
कालिंका मंदिर के पुजारी ममगाई जाति के हैं, जिनका मूल गाँव थलीसैंण ब्लॉक की चौपड़ाकोट पट्टी का जखोला था। एक लोकश्रुति के अनुसार, प्रथम पुजारी ललित बडियारी अपने सात पुत्रों के साथ यहाँ पहुँचे थे और लैली उडयार में रहते थे। गोरख्याणी काल में उनके वंशजों ने इसी उडयार में शरण लेकर अपनी जान बचाई थी। आज भी पुजारी परंपरा, पूजा-पद्धति और मनौती के स्वरूप में बडियारी समुदाय की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है।
कालिंका मंदिर का आधुनिक स्वरूप, लोककथा और बडियारी समुदाय –
कालिंका मंदिर का वर्तमान स्वरूप वर्ष 2010 के आसपास निर्मित हुआ, जिसका शिखर कमल-कली के आकार का है। मंदिर के पुनर्निर्माण और रखरखाव में पहाड़ी गाँवों के निवासियों द्वारा गठित “गढ़वाल–अल्मोड़ा काली मंदिर विकास समिति” सक्रिय भूमिका निभाती है। इस क्षेत्र में बडियारी समुदाय का इतिहास गहराई से जुड़ा हुआ है।
एक प्रसिद्ध लोककथा में बताया जाता है कि एक बडियारी चरवाहा रात में अचानक तेज रोशनी और कड़कती आकाशीय ध्वनि से जाग गया। एक उग्र और तीक्ष्ण आवाज़ ने उसे आदेश दिया कि वह शिखर पर चढ़कर देवी के लिए मंदिर का निर्माण करे। उसने आदरपूर्वक चढ़ाई की और शिखर पर पत्थरों से एक छोटा टीला बनाया, जो कालांतर में आज के विशाल मंदिर का मूल आधार बना। समय के साथ शिखर को झाड़ियों और वनस्पतियों से मुक्त कर मंदिर का निर्माण किया गया। आज भी बडियारी समुदाय की भागीदारी मंदिर-संरक्षण और जनसहयोग में महत्वपूर्ण है।
भूगोल, जलवायु और हिमालयी परिदृश्य-
मंदिर एक नंगे, समतल एवं चट्टानी शिखर पर स्थित है, जहाँ प्राकृतिक वनस्पति कम है। जैसे ही मंदिर परिसर से बाहर निकला जाए, आसपास घना मिश्रित वन प्रारंभ हो जाता है, जिसमें बंज ओक, रोडोडेंड्रोन, चीर पाइन सहित अनेक हिमालयी पौधों की विविधता देखने को मिलती है। गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों दिशाओं से यहाँ आने के कई पैदल मार्ग उपलब्ध हैं, जिनकी कठिनाई स्तर हल्की से मध्यम है। कालिंका डांडा से दूधाटोली पर्वतमाला, त्रिशूल मासिफ, पश्चिमी गढ़वाल की ऊँचाइयाँ और बंदरपुच्छ शिखर तक का भव्य परिदृश्य दिखाई देता है।
यह क्षेत्र उच्चभूमि उपोष्णकटिबंधीय जलवायु से प्रभावित है। गर्मियों में मौसम सुहावना रहता है, जबकि सर्दियों में तापमान अत्यंत गिर जाता है। वर्षभर अच्छी वर्षा होती है और लगभग हर मौसम में बर्फबारी भी संभव है। गर्मियों में तापमान दिन में 25–30 डिग्री और रात में 10–15 डिग्री तक पहुँचता है, जबकि सर्दियों में दिन का तापमान लगभग 15 और रात में 5 डिग्री के आसपास रहता है।
कालिंका मंदिर का सामरिक और सामाजिक महत्व –
जिस रिज पर कालिंका मंदिर स्थित है, वह मध्यकाल में गढ़वाल और कत्यूरी राज्यों के लिए अत्यंत सामरिक मार्ग था। यहाँ से दोनों क्षेत्रों की सीमाएँ नियंत्रित होती थीं और युद्धकाल में यह मार्ग सैनिक गतिविधियों के लिए अहम था। पूर्व दिशा में कुमाऊँ की कोमल ढलानों और उपजाऊ घाटियों का भूभाग मिलता है, जबकि पश्चिम में गढ़वाल का ऊबड़-खाबड़, चट्टानी और ऊँचा इलाका शुरू होता है। यह भूगोल दोनों राज्यों की सैन्य रणनीति, व्यापार और यात्राओं को प्रभावित करता था।
यह मार्ग गढ़वाल के पशु-व्यापार के लिए भी प्रसिद्ध था। कुमाऊँ की भैंसें अपनी प्रशिक्षण क्षमता और कठोर पर्वतीय जीवन के अनुकूलता के कारण बहुत प्रतिष्ठित थीं, और गढ़वाल के पशुपालक इन्हें खरीदने इस मार्ग से गुजरते थे। 1960 के दशक में, जब इस क्षेत्र में सड़कें नहीं पहुँची थीं, तब स्थानीय लोग रामनगर सहित तराई क्षेत्रों तक पैदल जाकर गुड़ और नमक जैसी आवश्यक वस्तुएँ लाते थे, क्योंकि पहाड़ों में ये उत्पन्न नहीं होती थीं। यात्राएँ प्रायः कुमाऊँ की ओर से की जाती थीं क्योंकि भूभाग अपेक्षाकृत सहज और कम कठिन था।
देवी कोल जौनपुर का कालिंका मेला : लोकपरंपरा और सामूहिक आस्था
जौनपुर क्षेत्र का देवी कोल कालिंका मेला भी गढ़वाल की सांस्कृतिक परंपराओं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। दिल्ली–यमुनोत्तरी मार्ग से बंदर खरसौन, क्यारी और सुमन क्यारी पहुँचने के बाद मात्र पाँच मील की चढ़ाई पर कालिंका डांडा दिखाई देता है। 4500 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर तीन गाँवों — खरक, खुरासू और काण्डी — की सीमा पर है। यहाँ देवी 19 गाँवों की इष्टदेवी रूप में पूजित हैं।
प्राचीन काल में मैदानी आक्रमणकारी यमुना के दर्रों से अगलार घाटी तक पहुँचते थे। इस खतरे को रोकने के लिए श्रीनगर नरेश ने अपने सामंतों और उनके अधीन गाँवों को यहाँ बसने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप कई गाँव इस क्षेत्र में स्थापित हुए, जिनकी जातिगत और सांस्कृतिक जड़ें आज भी कालिंका मेले में दिखाई देती हैं। बैसाख द्वितीया को लगने वाला यह मेला स्थानीय संस्कृति का अद्वितीय उत्सव है। लोग मोइला गीत गाते हुए, नृत्यमग्न होकर देवी मंदिर पहुँचते हैं और सामूहिक श्रद्धा का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामुदायिक पहचान का भी प्रबल प्रतीक बन चुका है।
समापन : कालिंका—आस्था, इतिहास, भूगोल और लोकजीवन का जीवंत संगम
कालिंका मंदिर, कालिंका मेला , महाकाली मेला, देवी कोल जौनपुर का आयोजन और साबलीगढ़ का इतिहास — सब मिलकर उत्तराखंड की सीमांत संस्कृति का अद्भुत मानचित्र प्रस्तुत करते हैं। यह स्थल केवल पूजा या मेले का केंद्र नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की सामूहिक स्मृति, संघर्ष, श्रम, व्यापार, पुराण, लोककथाओं और परंपराओं का जीवंत दस्तावेज़ है। बीरोंखाल और जौनपुर दोनों क्षेत्रों के कालिंका स्थलों में वह आत्मीयता, शक्ति और सांस्कृतिक जुड़ाव मौजूद है, जिसे पीढ़ियाँ सँजोती आई हैं और आगे भी सँजोती रहेंगी।
संदर्भ: प्रो शिवदत्त नैथानी पुस्तक ,” गढ़वाल की संस्कृति इतिहास और लोक साहित्य ,और विकीपीडिया
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