Wednesday, April 2, 2025
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जगदीश कुनियाल जी ने जल संरक्षण से, सूखे जल स्रोत को दुबारा रिचार्ज कर दिया।

उत्तराखंड बागेश्वर के जगदीश कुनियाल  की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने साप्ताहिक कार्यक्रम मन की बात 2.0 में की। प्रधानमंत्री जी ने आज अपने कार्यक्रम में जल संरक्षण की उपयोगिता और जरूरत पर बात की । उन्होंने अपने कार्यक्रम की शुरुवात एक श्लोक से की –

| माघे निमग्ना: सलिले सुशीते, विमुक्तपापा: त्रिदिवम् प्रयान्ति।|

अर्थात , माघ महीने में किसी भी पवित्र जलाशय में स्नान को पवित्र माना गया है। प्रधानमंत्री जी ने नदी जल आदि  के बारे में बताते हुए, देश के कई भागों और लोगों की तारीफ की,जो जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने उत्तराखंड के बागेश्वर निवासी जगदीश कुनियाल जी का जिक्र भी किया। (जल संरक्षण )

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा , “साथियो, उत्तराखंड के बागेश्वर में रहने वाले जगदीश कुनियाल जी का काम भी बहुत कुछ सिखाता है। जगदीश जी का गाँव और आस-पास का क्षेत्र पानी की जरूरतों के लिये के एक प्राकृतिक स्रोत्र पर निर्भर था। लेकिन कई साल पहले ये स्त्रोत सूख गया।

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इससे पूरे इलाके में पानी का संकट गहराता चला गया। जगदीश जी ने इस संकट का हल वृक्षारोपण से करने की ठानी। उन्होंने पूरे इलाके में गाँव के लोगों के साथ मिलकर हजारों पेड़ लगाए और आज उनके इलाके का सूख चुका वो जलस्त्रोत फिर से भर गया है।

जगदीश कुनियाल जी ने जल संरक्षण से, सूखे जल स्रोत को दुबारा रिचार्ज कर दिया।

जगदीश कुनियाल और उनका जल संरक्षण –

उत्तराखंड ,बागेश्वर जिले के गरूड़ क्षेत्र के सिरकोट गांव के निवासी  जगदीश कुनियाल जी के मन मे प्रकृति प्रेम बचपन से ही था। जब वो 18 वर्ष के थे , तब उन्होंने अपनी 800 नाली जमीन में चाय का बागान लगा दिया। और बाकी बची हुई अपनी जमीन में ,अलग अलग प्रकार के पेड़ लगा दिये।

आरम्भ में जगदीश जी की जमीन में, बहुत जल स्रोत थे। बंजर छूटने की वजह से,सारे जल स्रोत सूख गए। जैसे जैसे जगदीश कुनियाल जी के पेड़ बड़े होते गए , बंजर जमीन हरीभरी होती गई।

और इसका सीधा असर जल स्रोतों पर पड़ा , भूमि की पानी सोखने की क्षमता बड़ी, और भू जल श्रोत बड़े, और बंजर जमीन के सारे जल स्रोत पुर्नजीवित हो गए।

आज यहां साल भर पानी रहता है। इस पानी का उपयोग खेती आदि कार्यो के लिए किया जाता है।

कुनियाल जी पिछले 40 साल से  पौधरोपण और जल संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने आज तक  विभिन्न प्रजातियों के लगभग 25000 पेेेड़ लगा दिए ।

कुनियाल जी के अथक भगीरथ प्रयास से सूखे गधेरे को रिचार्ज कर दिया।

प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी एवं सामाजिक कार्यकर्ता बसंत बल्लभ जोशी जी ने बताया कि, कुनियाल का पर्यवारण प्रेम अनूठा है। वह बिना किसी शोर शराबे पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं। दिखाओ से दूर रहकर उन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है। जो उत्तराखंड के अन्य लोगों के लिये एक आदर्श है।। (जल संरक्षण )

माननीय मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत जी ने भी , कुनियाल जी की तारीफ की है। उन्होंने ट्विटर से ट्वीट किया है –

“जिद जब जुनून में बदल जाए तो उसके सार्थक परिणाम जरूर मिलते हैं। उत्तराखंड के जनपद बागेश्वर निवासी श्री जगदीश कुनियाल जी ने अपने भगीरथ प्रयासों से कई साल पहले सूख चुके स्थानीय गदेरे को पुनः रिचार्ज कर तमाम गांवों में न केवल पेयजल संकट बल्कि सिंचाई की समस्याओं को भी दूर किया है।”

निष्कर्ष –

इस साल फरवरी में उत्तराखंड का तापमान 28 डिग्री से 30 डिग्री चल रहा है। इसका मुख्य कारण पेड़ो का अनियंत्रित दोहन ही है। इसकी वजह से हमे असमान मौसम का सामना करना पड़ रहा है। (जल संरक्षण )

मित्रों कुनियाल जी इस संकट का समाधान ढूढ लिया था वृक्षारोपण और उन्होंने इसके दम पर , सूखे हुए  जल स्रोत को जल से परिपूर्ण कर दिया। प्रकृति की हर समस्या का एक ही समाधान है, वृक्षारोपण।

इसलिए सभी मित्रों से निवेदन है कि, जगदीश जी को अपना प्रेरणा स्रोत मानकर अपने पर्यवारण की रक्षा में अपना सम्पूर्ण योगदान दें।

इन्हे पढ़े _

खोल दे माता खोल भवानी ,एक पारम्परिक कुमाऊनी झोड़ा गीत।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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