संस्कृति

होली का मजा , गांव या शहर की , कौन सी होली बेस्ट है।

होली का मजा तो गाँव मे ही आता था।  शहर में तो क्याप ठैरा।

शहर की होली

शहर में सुबह उठो नाश्ता करो, घुट लगाने वाले घूट लगाओ। फिर हाथ मे  रंग का थैला लेकर चल दो, जो मिले उसे रंग मल दो। किसी के कमरे में जाओ, पापड़ गुजिया खाओ , अगर मिल गई तो एक घूट , उसे भी गटक लो,  ब्रांड नही देखनी , बस पीते जाओ। यही क्रियाकलाप करते करते थोड़ी देर बाद ,आदमी को खुद पता नही चलता ,वो कौन है। अगर कम पी है,और शरीर मे जान है,तो आदमी जैसे तैसे अपनी चौखट पर सिर रख देता है। नही तो फ़ेसबुक पर होली के रुझानों में दिखता है। उल्टी सुल्ति करते कराते ,आदमी को ऐसी कलटोप पड़ती है, आधी रात को ही नींद खुलती है,वो भी सूखे गले और सर् दर्द के साथ। ये तो है शहर की होली।

अब चलते हैं गांव की यादों में

होली का मजा
होली का असली मजाI

गांव की होली का मजा –

होली का असली मजा तो गांव में ही है। मेरी गांव की होली की बहुत सुनहरी यादें है। गांव की यादों में ,एकादशी से होली शरू हो जाती है। बचपन मे बुबु हमारे लिए नए कपड़े बनाते थे, कुर्ता पैजामा और कुमौनी टोपी। फिर शुरू होता था, गांव की होली का आनंद। रोज दिन में महिला होली, शाम को खड़ी होली ,रात को बैठक  होली।

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हम बच्चे थे, हमको महिला होली में भी जाने की मनाही नही थी। हम महिला होली का आनन्द भी लेते थे। महिलाओ के ठेठर और स्वांग देखने में बड़ा मजा आता था। उसके बाद शाम को होली के कपड़े पहन कर बुबु के साथ होली गाने चले जाते थे। फिर बुबु के कंधे में बैठ कर होली का आनंद लेना। होली मध्यान्ह में जब किर्तन गाये  जाते थे, तब गांव के दूसरे बुबु  गुड़ की भेली के बीच मे बहुत सारा घी रख कर गुड़ फोड़ते थे।  फिर हमारी जद्दोजहद शुरू हो जाती थी ,एक गुड़ का टुकड़ा पाने के लिए। गुड़ तो पूरा मिलता था। पर आलू गुटुक ,बच्चों को हाथ मे देते थे। और बड़ो को पत्तल में। उस समय ये बहुत अन्याय लगता था। काश उस समय भी मानवाधिकार आयोग होता। मगर होली का मजा पूरा आता था।

घर से आमा एक थैली अलग से गुड़ इक्कठा करने के लिए दी रहती थी। जैसे सरकारी कर्मचारियों को मार्च में अपना टारगेट पूरा करना होता है, वैसे ही हमे भी आमा का प्रतिदिन का टारगेट  पुरा करना होता था। रोज थैली भर के आमा को दैनी थी।

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चतुर्दशी को बहुत मजा आता था, उस दिन होली नजदीक के शिव मंदिर में जाति थी,वहाँ अनेक गावो की होली आती थी। हमे तो बस होली का कलाकन्द खाने का लालच रहता था। मगर उस दिन शिव मंदिर तक कोरे पहुचना किसी चुनौती से कम ना होता था। जितने गांवो से मंदिर का रास्ता जाता था,वो गांव वाले पानी और गाय के

गोबर के साथ स्वागत के लिए तैयार रहते थे। वहां जाकर बुबु से 10 रुपये मांगना, और 5 के कलाकंद भस्काना। और 5 रुपये के आलू गुटुक। फिर आती थी अंतिम होली यानी छलड़ी , इस दिन बहुत मजे होते थे, होली का मजा तो इसी दिन आता था।

छलड़ी के दिन सुबह फजल उठ कर, जवान और बच्चे ढोल दमुआ लेकर गाँव मे छलड़ी खेलने चल देते थे। और बुड्ढे लोग मोर्चा सम्हालते थे, मंदिर में होली का हलुवा बनांने के लिए। हम एक एक करके सबके आंगन में जा कर ,ढोल बजा कर होली की आशीषें गाते थे।और अंदर से भाभी जी रंग फेकती थी। फिर एक घाट पर नहाधोकर वापस गांव में आते थे। फिर होली का विदाई  गीत , “है हो हैं तुम कब लक आला “ गाते थे, सच मे दिल भर जाता था।

फिर होली के प्रसाद का वितरण होता था, और हमको एक भगोना ज्यादा मिलता था, क्योंकि मेरे बुबु होली के डांगर हुआ करते थे।

जो होली स्टार्ट करते हैं, और होली को लीड करते हैं उनको डांगर कहते हैं।

उसके बाद तैयारी होती थी , बकरे की , फीर रजिस्टर में हिसाब लिखा जाने लगता था, कौन कितना शिकार लेगा।

मित्रों उपरोक्त लेख मे मैंने, होली का मजा गांव और शहर दोनो जगह का वर्णन किया है। अब आप बताइए  ? कौन सी होली का मजा सबसे असली मजा है ?

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