केदारनाथ धाम भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है।जो कीसमुद्र तल से 11,746 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम मंदिर तीनो तरफ पहाड़ियों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड है।
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केदारनाथ धाम का इतिहास
यह मंदाकिनी नदी के उद्गगम स्थल के समीप है। यमुनोत्री से केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक को हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है। वायु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु मानव जाति के कल्याण के लिए पृथ्वी पर निवास करने आए। उन्होंने बद्रीनाथ में अपना पहला कदम रखा। इस जगह पर पहले भगवान शिव का निवास था।
लेकिन उन्होंने नारायण के लिए इस स्थान का त्याग कर दिया और केदारनाथ में निवास करने लगे। इसलिए पंच केदार यात्रा केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड।
८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े भूरे रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है। फिर भी इतिहासकारो का मानना है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं।
इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है।
केदारनाथ मंदिर को तीन भागों में बांटा गया है
मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये। केदारनाथ मंदिर को तीन भागों में बांटा गया है – पहला, गर्भगृह। दूसरा, दर्शन मंडप, यह वह स्थान है जहां पर दर्शानार्थी एक बड़े से हॉल में खड़ा होकर पूजा करते हैं।
तीसरा, सभा मण्डप, इस जगह पर सभी तीर्थयात्री जमा होते हैं। तीर्थयात्री यहां भगवान शिव के अलावा ऋद्धि सिद्धि के साथ भगवान गणेश, पार्वती, विष्णु और लक्ष्मी, कृष्ण, कुंति, द्रौपदि, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की पूजा अर्चना भी की जाती है।केदारनाथ मंदिर न केवल आध्यात्म के दृष्टिकोण से वरन स्थापत्य कला में भी अन्य मंदिरों से भिन्न है। यह मंदिर कात्युरी शैली में बना हुआ है।
केदारनाथ मन्दिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है
यह पहाड़ी के चोटि पर स्थित है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग बहुतायत में किया गया है। इसका छत लकड़ी का बना हुआ है जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है। मंदिर के बाह्य द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी का विशालकाय मूर्ति बना हुआ है। मन्दिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है और इसे एक चतुर्भुजाकार आधार पर पत्थर की बड़ी-बड़ी पटियाओं से बनाया गया है।
गर्भगृह की ओर ले जाती सीढ़ियों पर श्रृद्धालुओं को पाली भाषा के शिलालेख देखने को मिल जाते है। समुद्रतल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित होने के कारण चारों धामों में से यहाँ पहुँचना सबसे कठिन है। मन्दिर गर्मियों के दौरान केवल 6 महीने के लिये खुला रहता है।
यह तीर्थस्थान सर्दियों के दौरान बन्द रहता है क्योंकि इस दौरान क्षेत्र में भारी बर्फबारी के कारण यहाँ की जलवायु प्रतिकूल हो जाती है। इस दौरान केदारनाथ के मूल निवासी निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं और भगवान केदारनाथ की पालकी को उखिमठ ले जाया जाता है।
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केदारनाथ के आस पास के पर्यटक स्थल
यहाँ आने वाले यात्रियों को मन्दिर के निकट स्थित आदि गुरू शंकराचार्य की समाधि पर अवश्य जाना चाहिये। शंकराचार्य प्रसिद्ध हिन्दू सन्त थे जिन्हें अद्वैत वेदान्त के प्रति जागरूकता फैलाने के लिये जाना जाता है। चारों धामों की खोज के उपरान्त 32 वर्ष की आयु में उन्होनें इसी स्थान पर समाधि ली थी।
सोनप्रयाग और वासुकीताल
केदारनाथ से 19 किमी की दूरी पर और 1829 मी की ऊँचाई पर स्थित है। यह मुख्यतः बासुकी और मन्दाकिनी नदियों को संगम स्थल है। यह स्थान यहाँ के पानी की जादुई शक्तियों के कारण लोकप्रिय है। लोककथाओं के अनुसार लोगों को इस जल को छूने मात्र से बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। वासुकी ताल केदारनाथ से 8 किमी की
दूरी पर और समुद्रतल से 4135 मी की ऊँचाई पर स्थित एक और प्रमुख स्थान है। यह झील हिमालय की पहाड़ियों से घिरा है जो इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। शानदार चौखम्भा चोटी भी इसी झील के समीप स्थित है। वासुकी ताल तक पहुँचने के लिये चतुरंगी और वासुकी हिमनदियों को पार करना पड़ता है जिसके लिये असीम सहनशक्ति की आवश्यकता पड़ती है।
वन्यजीव अभ्यारण्य
केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण्य अलकनन्दा नदी की घाटी में स्थित है। यह अभ्यारण्य 967 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला है। अभ्यारण्य में चीड़, ओक, भूर्ज, बगयल और ऐल्पाइन के घने पेड़ पाये जाते हैं। इस स्थान की विवध भौगोलिक स्थिति के कारण विभिन्न प्रकार के पौधे और जानवर यहाँ पाये जाते हैं। भारल, बिल्लियाँ, गोरल, भेड़िये, काले भालू, सफेद तेंदुये, साँभर, तहर और सेराव जैसे जानवरों को आसानी से देखा जा सकता है।
अभ्यारण्य केदारनाथ कस्तूरी मृग जैसे विलुप्तप्राय जीवों का संरक्षण भी करता है। पक्षियों में रूचि रखने वाले लोग फ्लाईकैचर, मोनल, स्लेटी चित्ते वाले वार्बलर जैसे विभिन्न प्रकार के पक्षियों को देख सकते हैं। इसके अलावा पर्यटक मन्दाकिनी नदी में शाइजोथोरैक्स, नेमाचेलियस, गारा, बैरिलियस और महसीर टोर टोर की विभिन्न प्रजातियों की मछलियों को भी देख सकते हैं।
गुप्तकाशी
केदारनाथ आये पर्यटकों को गुप्तकाशी भी जाना चाहिये। इस क्षेत्र में 3 मन्दिर हैं जिनमें प्राचीन विश्वनाथ मन्दिर, मणिकर्णिक कुण्ड और अर्द्धनारीश्वर मन्दिर शामिल हैं। भगवान शिव को समर्पित अर्द्धनारीश्वर मन्दिर में श्रृद्धालु भगवान की मूर्ति को आधे पुरूष और आधे स्त्री के रूप में देख सकते हैं।
विश्वनाथ मन्दिर में भी भगवान शिव के कई अवतारों की मूर्तियाँ हैं। लगभग आधे किमी की दूरी पर स्थित भैरवनाथ मन्दिर केदारनाथ का एक और लोकप्रिय मन्दिर है। यह मन्दिर भगवान शिव के एक गण भैरव को समर्पित है। मन्दिर में इष्टदेव की मूर्ति को केदारनाथ के प्रथम रावल श्री भिकुण्ड ने स्थापित किया था।
गौरीकुंड
1982 मी की ऊँचाई पर स्थित गौरीकुण्ड केदारनाथ का एक प्रमुख आकर्षण है। यहाँ पर एक प्राचीन मन्दिर है जो हिन्दू देवी पार्वती को समर्पित है। लोककथाओं को अनुसार यहीं पर देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिये तपस्या की थी। गैरीकुण्ड में एक गर्म पानी का सोता है जिसके पानी के न सिर्फ औषधीय गुण हैं बल्कि इससे लोगों को अपने पापों से भी मुक्ति मिलती है।
केदारनाथ कैसे जाएं
यहाँ के लिये निकटतम हवाईअड्डा 239 किमी की दूरी पर देहरादून का जॉली ग्रान्ट हवाईअड्डा है।जो यात्री रेल द्वारा आना चाहें वे अपना टिकट 227 किमी की दूरी पर स्थित ऋषिकेश रेलवे स्टेशन के लिये बुक कर सकते हैं।केदारनाथ जाने का सबसे अच्छा समय मई से अक्टूबर के मध्य का समय आदर्श माना जाता है क्योंकि इस दौरान मौसम काफी सुखद रहता है। जाड़ों में भारी बर्फबारी के कारण केदारनाथ के मूल निवासी भी सर्दियों में पलायन कर जाते हैं।
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