Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

भूमिका :- हरेला पर कविता : उत्तराखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक हरेला पर्व, कर्क संक्रांति पर श्रावण मास के पहले दिन मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति के प्रति प्रेम, कृषि विज्ञान और सामाजिक एकता को दर्शाता है। सात या पांच अनाजों का मिश्रण बोकर अंकुरण के माध्यम से समृद्धि का संदेश दिया जाता है। मातृशक्ति की देखरेख में तैयार हरेला, पकवानों और पौधरोपण के साथ पर्यावरण संरक्षण का प्रण लेता है। यह कविता हरेला पर्व की भावना को उजागर करती है, जो देवभूमि की परंपराओं और प्रकृति के प्रति उत्तराखंडवासियों के अटूट प्रेम को व्यक्त करती…

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पिछले दो हफ्तों से उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में एक गीत तहलका मचा रहा है— पंचाचूली देश ! यह गाना सोशल मीडिया पर खूब ट्रेंड कर रहा है, और लोग इसके ऊपर रील्स बनाकर इसे वायरल कर रहे हैं। लेकिन इस गीत के पीछे छिपे दर्द और गहराई को शायद ही हर किसी ने समझा हो। यह गाना न सिर्फ एक सांस्कृतिक प्रस्तुति है, बल्कि उत्तराखंड के वासियों के दिल के दर्द को भी अभिव्यक्त करता है। इसे लिखा और गाया है गणेश मर्तोलिया ने, जिन्होंने अपनी साथी गायिका रुचि जंगपांगी के साथ मिलकर इस गीत को नई ऊंचाइयों तक…

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IPS, IG बनी ग्राम प्रधान , पिथौरागढ़  : सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और उत्तराखंड की पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (IG) विमला गुंज्याल को उनके पैतृक गांव गुंजी का ग्राम प्रधान निर्विरोध चुना गया है। धारचूला में ग्राम प्रधान चुनाव के रिटर्निंग अधिकारी प्रमोद मिश्रा ने बताया कि नामांकन के अंतिम दिन शनिवार को किसी अन्य प्रत्याशी ने पर्चा दाखिल नहीं किया, जिससे विमला गुंज्याल का निर्वाचन तय हो गया। गुंजी गांव पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत-चीन सीमा के निकट स्थित है। यह केंद्र सरकार की ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ का भी हिस्सा है। उत्तराखंड में पंचायत चुनाव दो चरणों – 24…

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टनकपुर, 04 जुलाई 2025: देवभूमि उत्तराखंड के टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025 का शुभारंभ हो गया है। पर्यटन आवास गृह टनकपुर में पहले दल के 45 श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक उत्साह के साथ हुआ। इस दल में 32 पुरुष और 13 महिलाएं शामिल हैं, जो देश के विभिन्न राज्यों से आए हैं। “बम-बम भोले” के जयघोष, ढोल-दमऊ की गूंज, छोलिया नृत्य, आरती, तिलक और पुष्पवर्षा के साथ श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत किया गया। कोविड-19 महामारी के कारण 2019 से स्थगित इस पवित्र यात्रा को इस वर्ष पुनः शुरू किया गया है, जो श्रद्धालुओं के लिए…

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उत्तराखंड में सावन 2025 का प्रारंभ और समापन – उत्तराखंड में सावन 2025 (Uttarakhand Sawan 2025) का महीना 16 जुलाई 2025 से शुरू होगा और 15 अगस्त 2025 को समाप्त होगा। यह अवधि हरेला पर्व के साथ शुरू होती है, जो उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 21 जुलाई को आएगा, और 16 अगस्त को सिंह संक्रांति के साथ भाद्रपद माह शुरू हो जाएगा। देश के अन्य हिस्सों में सावन की तिथियां भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, भारत के मैदानी क्षेत्रों  में सावन 11 जुलाई 2025 से 9…

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उत्तराखंड के हरेला पर्व पर निबंध – भारत एक विविधताओं का देश है। भारत देश में एक नीले आसमान के नीचे कई समृद्ध संस्कृति फल फूल रही हैं। भारत की अनेकताओं में कुछ त्यौहार ऐसे हैं ,जो सारे देश को एक साथ जोड़ते हैं।  सावन माह में देवभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तराखंड में एक प्रकृति को समर्पित त्यौहार हरेला मनाया जाता हैं। उत्तराखंड के निवासी प्राचीन काल से ही ,प्रकृति के प्रति अपना प्रेम और अपनी जिम्मेदारी को बखूबी दर्शाते आएं हैं। उत्तराखंड में मनाया जाने वाला यह पर्व मूलतः पर्यावरण के साथ साथ कृषि विज्ञानं को भी समर्पित है।…

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हरेला पर्व 2025हरेला पर्व 2025 में कब मनाया जाएगा ? हरेला पर्व, उत्तराखंड का एक प्रमुख सांस्कृतिक और कृषि उत्सव, वर्ष 2025 में 16 जुलाई को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। इस पर्व के लिए हरियाला बोने की तिथियां इस प्रकार निर्धारित हैं: 11 दिन वालों का हरेला: 06 जुलाई 2025 को बोया जाएगा। 10 दिन वालों का हरेला: 07 जुलाई 2025 को बोया जाएगा। 08 जुलाई को 09 दिन का हरेला बोया जायेगा। हरियाला बोने का शुभ दिन ज्योतिषीय गणना के आधार पर चुना जाता है, जो भद्रादि दोषों से मुक्त हो। यह पर्व श्रावण मास की संक्रांति…

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परिचय – कोटगाड़ी देवी मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। यह मंदिर देवी भगवती को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग न्याय की देवी के रूप में पूजते हैं। यह मंदिर पिथौरागढ़ मुख्यालय से 55 किमी और डीडीहाट से 23 किमी की दूरी पर थल के निकट पांखू गांव में स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए थल से 2 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यह स्थान न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि मध्यकालीन व्यवसायिक कस्बे के रूप में भी जाना जाता है। कोटगाड़ी देवी की मान्यताएं – कोटगाड़ी देवी…

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कोटिप्रयाग, उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में रुद्रप्रयाग जनपद की कालीमठ घाटी में स्थित एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यह स्थान मंदाकिनी और कालीगंगा नदियों के संगम पर बसा है, जिसे इसके पुराणोक्त महत्व के कारण ‘उत्तरगया’ और ‘कोटिप्रयाग’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिकता का भी अनूठा संगम है। इस लेख में हम कोटिप्रयाग के धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व को विस्तार से जानेंगे। कोटिप्रयाग का धार्मिक महत्व – कोटिप्रयाग का उल्लेख स्कंद पुराण के केदार खंड (अध्याय 90) में मिलता है, जहां इसे गंगा के…

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हिमालयी राज्य उत्तराखंड की गोद में पलने वाली झूला घास, जिसे वैज्ञानिक भाषा में लाइकेन (Lichen) कहा जाता है, प्रकृति का एक अनोखा चमत्कार है। यह फफूंदी (Fungus) और शैवाल (Algae) के परस्पर लाभकारी (Symbiotic) संबंध से बना एक जीव है, जो पेड़ों की छालों और चट्टानों पर उगता है। सतह पर यह मामूली प्रतीत हो सकता है, किंतु इसके पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व को समझना आवश्यक है। जैविक संरचना और पारिस्थितिक भूमिका – झूला घास लाइकेन एक हेलोटिज्म (Helotism) संबंध का परिणाम है, जिसमें शैवाल प्रकाश संश्लेषण से कार्बोहाइड्रेट बनाता है और फफूंदी उसे जल, खनिज, और सुरक्षा प्रदान…

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