कुमाऊनी शिव भजन ;– उत्तराखंड की लोक-भक्ति परंपरा में कुमाऊनी शिव भजन लिरिक्स का विशेष स्थान है। इन्हीं में से एक अत्यंत लोकप्रिय भजन है — शिव हरी कैलाशा। . यानी “शिव हरी कैलाशा… तेरो डमरू बाजो डम–डमा”।
यह पारंपरिक पहाड़ी शिव भजन ढोलक की ताल पर गाया जाता है, इसलिए इसे लोग प्यार से ढोलक वाला शिव भजन उत्तराखंड भी कहते हैं। शिवरात्रि, कीर्तन, चौमास और गाँव की संध्याओं में यह Kumaoni Shiv Bhajan Lyrics in Hindi आज भी उतनी ही श्रद्धा से गाया जाता है।
यह भजन भगवान शिव की महिमा, उनके डमरू की नाद-ध्वनि और माँ पार्वती के साथ कैलाश धाम की दिव्यता को बेहद सरल कुमाऊनी शब्दों में प्रस्तुत करता है।
Table of Contents
पारंपरिक कुमाऊनी शिव भजन – लिरिक्स (shiv hari kailasha tero damru baje lyrics)
मुखड़ा –
शिव हरी कैलाशा… तेरो डमरू बाजो डम – डमा।
माँ पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
जोड़ –
बभूति मले बदन में, गल सर्पों की माल।
ज्यूँ गंग जटा में, पैरि मृगै की छाळ।।
अंतरा-
बैठ नन्दी को पीठ मा… तेरो डमरू बाजो डम – डमा।
माँ पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।।
शिव हरी कैलाशा… तेरो डमरू बाजो डम – डमा।
माँ पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
जोड़ –
द्याप्त रूनी सरग मा, तुम रूंछा कैंलाशा।
मैपुवा खबर नैहति, हिमाल छु सरासा।।
अंतरा –
नौ छु भूतनाथा… तेरो डमरू बाजौ डम – डमा।
पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
शिव हरी कैलाशा… तेरो डमरू बाजो डम – डमा।
माँ पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
जोड़ –
द्याप्तों लै अमृत पियो, राकशोंलै शराबा।
जहर पीने की शिबो, तुमरी तापा!!
अंतरा
नीलकंठ भोले नाथा, तुमर डमरू बाजो डम – डमा।
पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
शिव हरी कैलाशा… तेरो डमरू बाजो डम – डमा।
माँ पार्वती का साथा, तेरो डमरू बाजों डम – डमा।। – 2
भजन का भावार्थ (Kumaoni Shiv Bhajan Lyrics in Hindi ) –
इस तेरो डमरू बाजो डम डमा भजन में शिव के उस लोकस्वरूप का वर्णन है जिसमें वे—
- शरीर पर भस्म रमाए हुए
- गले में सर्पों की माला धारण किए
- जटाओं में गंगा और चरणों में मृगछाल लिए
- नंदी की पीठ पर विराजमान
नीलकंठ बनकर संसार का विष पीने वाले करुणामय भोलेनाथ
लोकभावना कहती है—देवताओं ने अमृत पिया, राक्षसों ने मदिरा, पर पूरे जगत की रक्षा के लिए विष पीने का त्याग केवल शिव ने किया। यही कारण है कि हर पारंपरिक पहाड़ी शिव भजन में भोलेनाथ को “नीलकंठ” कहकर स्मरण किया जाता है।
कैलाश परंपरा और कुमाऊनी लोकभक्ति –
कुमाऊँ के शिव भजनों में “कैलाशा” शब्द बार-बार आता है। मान्यता है कि शिव का दिव्य निवास Mount Kailash पर है। इसी आस्था से प्रेरित होकर यह Shiv Hari Kailasha Kumaoni Bhajan पहाड़ों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाया जाता रहा है।
ढोलक की ताल, सामूहिक स्वर और “डम–डमा” की गूंज — यही इस ढोलक वाला शिव भजन उत्तराखंड की असली पहचान है।
कुमाऊनी शिव भजन लिरिक्स – म्यर शिवजयू महादेवा ।
