Wednesday, April 2, 2025
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आदिबद्री : एक प्राचीन पवित्र तीर्थ और सांस्कृतिक धरोहर

आदिबद्री : एक प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल :

उत्तराखंड के केदारखंड में स्थित आदिबद्री , पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह स्थान चमोली जनपद में कर्णप्रयाग-रानीखेत मोटर मार्ग पर, कर्णप्रयाग से 18 कि.मी. तथा गोपेश्वर से 57 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। दूधातोली पर्वत से निकलने वाली उत्तर नारायणगंगा के किनारे, 3800 फीट की ऊंचाई पर बसे इस तीर्थ को भगवान विष्णु की आदि तपस्थली माना गया है।

पांच बद्री तीर्थों में प्रथम स्थान :

आदिबदरी, बदरीनाथ से जुड़े पांच बद्री तीर्थस्थलों में सबसे पहले आता है। इसीलिए इसे ‘आदि’ नाम दिया गया है। इस स्थल पर कुल 16 मंदिरों का समूह है, जिनमें से वर्तमान में 14 मंदिर शेष हैं। यह मंदिर समूह 85 फीट लंबाई और 42 फीट चौड़ाई के क्षेत्र में स्थित है। यहां का प्रमुख मंदिर लक्ष्मीनारायण मंदिर है, जो 20 फीट ऊंचा है।

मंदिरों की वास्तुकला और मूर्तिकला :

आदिबद्री के मंदिर नागर शैली में निर्मित हैं। इनकी दीवारें कटे हुए पत्थरों से बनी हैं, और द्वार पाषाण शिलाओं से सजाए गए हैं। मंदिर के द्वारों पर देवी-देवताओं, गंधर्व-किन्नरों, कीर्तिमुख, और अन्य पौराणिक पात्रों की सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं।

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यहां के मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की 3 फीट ऊंची चतुर्भुजी मूर्ति है, जिसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं। इस प्रतिमा के ऊपर चांदी का छत्र और मुकुट स्थापित है। मंदिर के ठीक सामने एक छोटे मंदिर में भगवान गरुड़ की प्रतिमा स्थित है।

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आदिबद्री

इतिहास और पौराणिकता :

माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण गुप्तकाल के दौरान विक्रम की सातवीं शताब्दी में हुआ। मंदिरों के शिलालेख और उत्कीर्ण मूर्तियां दक्षिण भारतीय शिल्प शैली का उदाहरण हैं। यह आश्चर्य का विषय है कि भारी-भरकम पत्थरों से बनी इन मूर्तियों को इस दुर्गम क्षेत्र में कैसे लाया गया होगा।

त्योहार और उत्सव :

आदिबद्री के कपाट हर वर्ष पौष संक्रांति (15/16 दिसंबर) से मकर संक्रांति (14 जून) तक बंद रहते हैं। यहां मकर संक्रांति और वैशाख के पांचवे तथा ज्येष्ठ के प्रथम सोमवार को ‘नौढ़ा मेला’ आयोजित होता है, जिसे ‘लठमार मेला’ भी कहा जाता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व :

आदिबद्री न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि गढ़वाल के प्राचीन शासन केंद्रों—चांदपुर और देवलगढ़ के ऐतिहासिक मार्गों में भी इसका महत्व है। इसके पुजारी परंपरागत रूप से मल्ला चांदपुर के थपल्याल परिवार से हैं।

निष्कर्ष :

आदिबद्री एक ऐसा तीर्थस्थल है जो अपने धार्मिक महत्व, अद्भुत वास्तुकला और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण भक्तों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है। यह स्थान भगवान विष्णु की उपासना के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और शिल्पकला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। उत्तराखंड की इस अनमोल धरोहर को अवश्य देखना चाहिए।

संदर्भ – उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक। 

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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