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त्रिनेत्रेश्वर मंदिर – मान्यता है कि भगवान् शिव ने यहाँ अपना तीसरा नेत्र खोला था।

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त्रिनेत्रेश्वर मंदिर और एकादश रूद्र के नाम से प्रसिद्ध मंदिरो का ये समूह उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 48 किलोमीटर दूर लमगड़ा ब्लॉक से 6 किलोमीटर दूर बमनसुयाल मल्ला लखनपुर में स्थित है। यह मंदिरों का समूह थमिया और सुयाल। नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ थामिया गधेरे ( छोटी नदी ) के उत्तरी किनारे पर पांच मंदिरों का समूह है। इसके अलावा इसके दक्षिणी छोर के समतल मैदान पर ग्यारह मंदिरों का समूह है।

इन सोलह मंदिरों की स्थापत्य कला बेजोड़ है। त्रिनेत्रेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर समूह के पांच मंदिरों में पहला स्वयं त्रिनेत्रेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। इसके बाद कार्तिकेय मंदिर ,उमा -महेश ,बटुक भैरव व् हर हर महादेव मंदिर हैं ,जो मंदिरों के नामानुसार देवताओं को समर्पित हैं। इसके अलावा इन मंदिर समूहों में जैन प्रस्तर मूर्तियां और आरम्भिक काल के ताम्रपत्र भी अव्यवस्थित हैं। स्थापत्य और धार्मिक रूप से मजबूत इस मंदिर का दुर्भाग्य है कि इस मंदिर को इसके महत्व के बराबर पहचान नहीं मिली।

त्रिनेत्रेश्वर मंदिर

त्रिनेत्रेश्वर मंदिर की धार्मिक मान्यता और पौराणिक कहानी –

पौराणिक कहानियों और लोककथाओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर मालूम होता है कि यह मंदिर धार्मिक रूप से काफी समृद्ध है। मान्यताओं के अनुसार एक बार माँ पार्वती ने हास् परिहास में भगवान् शिव की आखें अपने हाथों से बंद कर दी ,और पुरे ब्रह्माण्ड में अंधकार छा गया। तब भगवान् शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर संसार को ज्योति प्रदान की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस स्थान पर माँ पारवती ने क्रीड़ा करते हुए जिस स्थान पर भगवान् शिव की आखें बंद की वह स्थान त्रिनेत्रेश्वर मंदिर था।

इसके अलावा इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि ,सूखे या बारिश न होने की स्थिति में यहाँ सुबह जल चढ़ाया जाय तो शाम तक बारिश हो जाती है। धार्मिक महत्व इस मंदिर को अभी तक इसको समुचित महत्व नहीं मिला।

संदर्भ –

इन्हे भी पढ़े –

यहां कालकूट विष पीकर महादेव कहलाए नीलकंठ महादेव । सावन में विशेष महत्व है इस मंदिर का।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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