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मझखाली तिखोंन कोट की रोचक ऐतिहासिक किस्सा, जब पनकोट गांव के चिलवाल लोगों ने छुड़ाया ये किला ,और मिली थोकदारी

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आज हम आपको उत्तराखंड  कुमाऊँ मंडल के अल्मोड़ा जिले के  तिखोंन कोट का एक रोचक ऐतिहासिक व्रतांत बताते हैं। प्रस्तुत कथा , लोक कथाओं और श्री बद्रीदत्त पांडे जी द्वारा रचित पुस्तक कुमाऊँ के इतिहास पर आधारित है। यदि आपको कुमाऊँ का इतिहास पुस्तक लेनी हो तो इसी लेख में पुस्तक का ऑनलाईन लिंक अमेजॉन दिया है। कृपया करके आप वहाँ से मंगा सकते हैं।अब आपका अधिक समय ना लेते हुए, शुरू करते हैं ये रोचक कथा, जो आधारित है, पणकोट के चिलवाल जाती की वीरता पर।

तिखोंन कोट वर्तमान में मझखाली (उत्तराखंड ) क्षेत्र  को कहा जाता है।  यह ऊंची चोटी पर स्थित है। मझखाली  रमणीक पर्यटन स्थल है। यह क्षेत्र हिमालय दर्शन के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ से हिमालय एकदम साफ दिखाई देता है। ऐसा लगता है, कुछ कदम चलने के बाद, एक दो छोटे पर्वत पार करके हम सीधा हिमालय में प्रवेश कर जाएंगे। मझखाली पर्यटकों का प्रिय क्षेत्र है।

तिखोंन कोट  का राजा तिख़ौनी था । उसके किले का नाम तिख़ौन कोट था। तिख़ौन कोट एक ऊंची चोटी पर स्थित था। राजा तिख़ौनी कत्यूरियों  का मंडलीक राजा था। मतलब कत्यूरियों का सम्पूर्ण कुमाऊँ मेंं राज था,और छोटे छोटे राजाओं को जीत कर कत्यूरियों ने अपना मंडलीक राजा बना दिया था। तिख़ौनी भी इसी प्रकार का राजा था।

चंद वंशीय राजाओं  ने अपनी शक्ति बड़ाई और सम्पूर्ण कुमाऊँ में अपना राज्य विस्तार करने लगे ।इसी राज्य विस्तार में चंद राजाओं ने तिख़ौनी से तिख़ौन कोट किला जीतकर उसकी हत्या कर दी। अब तिखोंन किला चंद राजाओं का था ।एक बार तिख़ौन कोट में रणखीला गांव (तिख़ौन कोट पट्टी के अंतर्गत एक गाँव जो कोरीछीना की घाटी में बसा है ) के प्रहरी ने अपना अधिकार कर दिया था। उसने कुछ सेना इकठ्ठा करके अपने आप को तिख़ौन कोट का राजा घोषित कर दिया था।

चंद राजाओ ने तिख़ौन कोट को रणखील के प्रहरी राजा से  स्वतंत्र कराने के लिए अपनी थोड़ी सी सेना भेजी, मगर वह चंद सेना रणखील के प्रहरी सेना से हार कर वापस आ गई। अब चंद राजा परेशान हो गए कि तिख़ौन कोट को प्रहरी से कैसे मुक्त कराया जाय ?  चंद राजाओ की यह परेशानी को

को ग्राम पणकोट के चिलवाल जाती के लोगों ने समझा।  ग्राम पनकोट तिख़ौन कोट पट्टी , अल्मोडा  जिले में गोविंपुर नामक कस्बे के पास स्थित है। पणकोट के चिलवाल लोगो ने चंद राजाओं से तिखोंन कोट के राजा प्रहरी से युद्ध करने की अनुुमति मांगी , अब चंद राजाओ को तो, अपना तिख़ौन कोट छुड़ाना था। इसलिए उन्होंनेे अनुमति दे दी।  अब पणकोट के चिलवाल लोग ,प्रहरी राजा से युद्ध करने तिखोन कोट चले गए।

तिखोंन कोट का युद्ध
प्रतीकात्मक चित्र, केवल लेख को समझाने के लिए। वास्तविक फ़ोटो उपलब्ध नही है। फ़ोटो साभार – गूगल

वहाँ प्रहरी सेना और चिलवालों क बीच भयानक लड़ाई चल रही थी। और चिलवाल लोग प्रहरियों को हराने की युक्ति सोच रहे थे । चिलवालों के नेता थककर थोड़ी देर के लिए जमीन पर लेट गए, जमीन पर लेटने से उनको जमीन के अंदर पानी की आवाज सुनाई दी। जबचिलवालों ने वहाँ खोद कर देखा तो, वह तिख़ौन कोट के लिए भूगर्भीय पानी की नहर थी । जिसका पानी सीधे तिख़ौन कोट जा रहा था। अब प्रहरियों के हराने की युक्ति चिलवालों के हाथ लग चुकी थी।

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उन्होंने उस पानी की नहर को तोड़ दिया, जिससे प्रहरी सेना पानी के बिना परेशान हो गई और पणकोट के चिलवाल लोगों ने उनको युद्ध मे आसानी हरा दिया। इस प्रकार चिलवालों की वीरता के कारण ,चंद राजाओं का खोया हुआ तिख़ौन कोट ,फिर सेे उनके पास आ गया।

चिलवाल जाती के लोगो की इस वीरता और बहादुरी के इनाम में चंद राजाओ ने चिलवाल जाती के लोगो को तिख़ौन कोट पट्टी में थोकदारी ( कमीनचारी ) का पद दिया जो आज भी कायम है।

निवेदन –

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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