Home संस्कृति खान-पान सोमेश्वर के प्रसिद्ध मालपुए, विलुप्त होते पारम्परिक स्वाद का आखिरी ठिकाना

सोमेश्वर के प्रसिद्ध मालपुए, विलुप्त होते पारम्परिक स्वाद का आखिरी ठिकाना

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उत्तराखंड के लजीज व्यंजनों की तरह, उत्तराखंड के मालपुए काफी पसंद किये जाते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में यह व्यंजन काफी पसंद किया जाता है। विशेषकर अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर के प्रसिद्ध मालपुए काफी पसंद किये जाते हैं। मालपुए पहाड़ी क्षेत्रों की एक प्रसिद्ध मिठाई हुवा करती थी, जो आज लगभग विलुप्त हो गई है।

सोमेश्वर प्रसिद्ध के मालपुए

प्रसिद्ध हैं सोमेश्वर प्रसिद्ध के मालपुए –

उत्तराखंड के सोमेश्वर के मालपुए काफी प्रसिद्ध है। यदि आप कौसानी यात्रा पर हैं और अल्मोड़ा कौसानी रुट पर जा रहे हैं तो बीच में सोमेश्वर बाजार में सोमेश्वर के प्रसिद्ध मालपुओं का स्वाद लेना न भूलें। सोमेश्वर क्षेत्र के निवासी श्रीमान कृपाल सिंह नयाल जी लगभग कई वर्षों से सोमेश्वर में स्थित अपनी दुकान में मालपुए बनाते हैं। जो पूरे कुमाऊं में प्रसिद्ध है, जो भी यात्री सोमेश्वर आता है तो कृपाल सिंह नयाल जी के मालपुओं का विशेष स्वाद अपने साथ यादों के रूप में ले जाता है। उनका स्वाद इतना लाजवाब है कि हर कोई उनकी दुकान की ओर खींचा चला आता है।

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नयाल जी की दुकान सोमेश्वर के तल्ली बाजार हल्द्वानी केमू बस स्टेशन के समीप है। बताते है कि पहले यह व्यंजन पुरे कुमाऊं में बनाया जाता था। वर्तमान में केवल सोमेश्वर बाजार में नयाल जी बनाते हैं। कृपाल सिंह नयाल जी बताते है कि मालपुवा का काम उनका पुस्तैनी काम है। मालपुवा बनाने का काम उनका परिवार लगभग सौ साल से कर रहा है। उनके पिता भी इसी कार्य को करते थे। और उन्हें ख़ुशी है कि वे आज अपनी परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। और वे चाहते है उनके बच्चे भी उनकी अनमोल विरासत को आगे बढ़ाये। आज की तारीख में जहां उत्तराखंड की यह पारम्परिक मिठाई विलुप्ति की कगार पर है ,वही कृपाल सिंह नयाल जी ने पहाड़ की इस पारम्परिक धरोहर को सहेज कर रखा है।

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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