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कोट कांगड़ा देवी उत्तराखंड में द्वाराहाट की कुलदेवी के रूप में पूजित है।

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कोट कांगड़ा देवी उत्तराखंड : वैसे तो कोट कांगड़ा देवी का मूलस्थान हिमाचल के कांगड़ा जनपद के मुख्यालय में है किन्तु इसका एक मंदिर कुमाऊं मण्डल के अल्मोड़ा जनपद की रानीखेत तहसील में उसके मुख्यालय से रानीखेत-चौखुटिया रोड पर उत्तर की तरफ 38 किमी. तथा अल्मोड़ा से उत्तर पश्चिम की ओर समुद्र की सतह से 1540 मी. की ऊंचाई पर स्थित अल्मोड़ा जिला के द्वाराहाट नामक कस्बे में स्थित है। इसे यहां के चौधरी और शाह  लोगों की कुलदेवी कहा जाता है। चौधरी और शाह लोग नवरात्रों और अन्य शुभ अवसरो पर यहाँ पूजा अर्चना करते हैं। और शाह चौधरी लोगो के अलावा अन्य श्रद्धालुओं की भी यहाँ विशेष आस्था है।

कोट कांगड़ा देवी

कोट कांगड़ा देवी के द्वाराहाट आने की कहानी –

इसके यहां पर प्रतिष्ठापित किये जाने के संदर्भ में एक जनश्रुति प्रचलित है जिसका उल्लेख्य अट्किंसन ने भी अपने गजेटियर में किया गया है। उसके अनुसार सन् 1300 ई. के आसपास कत्यूरी शासक भुवनपालदेव के शासनकाल में कांगड़ा के परमारवंशीय चौधरी राजपूतों का एक दल अपनी कुलदेवी कोटकांगड़ा के डोले के साथ हिमालय की यात्रा कर रहा था तो एकाएक यह डोला दूनागिरी शक्तिपीठ के नीचे द्वाराहाट कस्बे में आकर स्तम्भित हो गया था।

डोला उठाने वालों द्वारा पूरा प्रयास करने पर भी जब डोला टस से मस न हुआ तो माना गया कि देवी को यह स्थान बहुत भा गया और वह यहां के शक्तिपीठ के निकट ही रहना चाहती है। अतः इसे देवी की मनोकामना मान कर एक देवालय का निर्माण करवा कर उसे यहीं पर प्रतिष्ठापित कर दिया गया। अब चौधरियों द्वारा इसकी अपनी कुलदेवी के रूप में तथा अन्य लोगों के द्वारा दैवी शक्ति के रूप में पूजा-अर्चना की जाती है।

सन्दर्भ – इस पोस्ट का संदर्भ उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक से साभार लिया है। 

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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