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कोदो की नेठाउण – उत्तराखंड के जौनसार में मनाया जाता है लोकपर्व

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कोदो की नेठाउण - उत्तराखंड के जौनसार में मनाया जाता है लोकपर्व

कोदो की नेठाउण- श्रीअन्न मडुवा, कोदो को समर्पित जौनसार का लोकपर्व कोदो की नेठाउण मनाया जाता हैं। यह उत्तराखंड के देहरादून जनपद के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर  के कृषकों का एक लोकउत्सव है, जो वर्षाकाल में मडुवे की गोड़ाई की समाप्ति पर मनाया जाता है। वस्तुतः मडुवा यहां के कृषि उत्पादों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण उत्पाद रहा है। उत्तराखंड लोकजीवन में मडुवा विशेष स्थान रहा हैं। मडुवा को स्थानीय भाषा मे कोदो कहा जाता है। कोदा एक पौष्टिक मोटा अनाज है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को मोटा अनाज का अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में घोषित किया है। इस प्रस्ताव को भारत देश ने प्रायोजित किया, तथा संसार के 70 देशों ने इसका समर्थन किया है। उत्तराखंड आदिकाल से ही मोटे अनाजों का समर्थक रहा है। उत्तराखंड के पहाड़वासियों के जनजीवन के मूलाधार मोटे अनाज ही रहें हैं। मडुवा, झोंगेरु, कौनी आदि के उत्पादन में उत्तराखंड अव्वल रहा है। जौनसार का यह लोक पर्व कोदो अर्थात मडुवे की गुड़ाई निपटने की खुशी में मनाया जाता है। किन्तु इसकी गोड़ाई का कार्य अत्यन्तश्रमसाध्य होने के कारण इसकी समाप्ति पर हर्षाभिव्यक्ति व आनन्दाभिव्यक्ति के रूप में ‘कोदो की नेठाउण’ मनायी जाती है। इस दिन पूरे गांव में मस्ती और आनन्द का माहौल रहता है। लोग विशेष भोजन का तथा जीवनदायक मडुवे की मदिरा का आनन्द लेते हुए मौज-मस्ती में झूमते, नाचते-गाते हैं। प्राकृतिक वनस्पतियों से बनी ‘कीम’ और उससे बनी मडुवे की मदिरा को न केवल मादक पदार्थ के रूप में अपितु एक जीवनदायिनी औषधि के रूप में भी लिया जाता है।

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वर्तमान में यह लोकपर्व जानकारी के अभाव और शाशन की नीरसता के चलते विलुप्ति की कगार पर खड़ा है। उत्तराखंड मोटे अनाज उत्पादक राज्यो में आता है। इसलिए समाज व शाशन प्रशासन को ऐसे लोकपर्वो को बढ़ावा देना चाहिए।

संदर्भ :- “उत्तराखंड ज्ञानकोष”  प्रो dd शर्मा जी 

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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

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