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मंदिर

शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक – जागेश्वर धाम ज्योतिर्लिंग

शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक जागेश्वर धाम ज्योतिर्लिंग

   जागेश्वर  धाम  शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है। यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा मंदिर समूह है। यह मंदिर कुमाउं मंडल के अल्मोड़ा जिले से 38 किलोमीटर की दुरी पर देवदार के जंगलो के बीच में स्थित है। जागेश्वर धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मंदिरों की एक नगरी है। जागेश्वर मंदिर में 125 मंदिरों का समूह है। जिसमे 4-5 मंदिर प्रमुख है जिनमे विधि के अनुसार पूजा होती है | जागेश्वर धाम मे सारे मंदिर समूह केदारनाथ शैली से निर्मित हैं।

जागेश्वर अपनी वास्तुकला के लिए काफी विख्यात है। बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित ये विशाल मंदिर बहुत ही सुन्दर हैं। उस समय के कारीगरों की विलक्षण प्रतिभा बिना सीमेंट, बिना मिट्टी के बड़ी बड़ी शिलाओं को इतनी बारीकी और इतनी विशेषज्ञता के साथ रखा गया है। कि यह दिखने में खूबसूरत तो लगते ह़ी हैं और साथ ह़ी साथ मजबूती भी प्रदान करते हैं।ये तब से आज तक जस के तस बने हुए हैं। मंदिर के ऊपर से जगह-जगह पर उनके द्वारा तरासी गई विभिन्न प्रकार की आकृतियां सच में मन मोह लेती है। मंदिर के निर्माण में ताबे की चादरों तथा देवदार की लकड़ी का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। दरवाजों में देवी देवताओं की मूर्तियों बहुत खूबसूरती से तरासी गई है। यहां बने मंदिरों का निर्माण आठवीं से 10 वीं शताब्दी के बीच कराया गया। उस समय के कारीगर शिल्प कला ,काष्ठ कला ,वास्तुकला में कितने माहिर थे। इस बात का यह मंदिर जीता जागता  प्रमाण हैं।मंदिरों के शिखर ऊंचे ऊंचे हैं तथा मंदिरों के शिखर के ऊपर लकड़ी की छत भी लगाई गई है जिसे बिजौरा कहा जाता है ।मंदिरों के निर्माण का श्रेय कत्यूरी और चंद्र शासकों को जाता है, जो कि सैकड़ों साल पहले इस क्षेत्र पर राज किया करते थे। कहा तो ये भी जाता है जागेश्वर धाम में भगवान शिव ने तप किया था।

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जागेश्वर में दो मंदिर बेहद खास है जिनमें एक शिव का मंदिर और दूसरा महामृत्युंजय का मंदिर। महामृत्युंजय शिव का ही एक रुप है जो इंसान केे मन से मृत्यु का भय दूर करते हैं व अकाल मृत्यु से बचाते हैं । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दुनिया का प्रथम मंदिर भी यही है जहां पर लिंग के रूप में शिव का पूजन का आरंभ हुआ।यह सबसे प्राचीन और सबसे विशाल मंदिर है। यहां पर विशाल शिवलिंग स्थापित हैै। तथा इसकी दीवारों पर भी महामृत्युंजय मंत्र लिखा हुआ है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बताया है और बाकायदा इसकी घोषणा करता एक शिलापट्ट भी लगाया है। एक सचाई यह भी है कि इसी मंदिर से ही भगवान शिव की लिंग पूजा के रूप में शुरूआत हुई थी। यहां की पूजा के बाद ही पूरी दुनिया में शिवलिंग की पूजा की जाने लगी और कई स्वयं निर्मित शिवलिंगों को बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाने लगा। ऐसी मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयं निर्मित यानी अपने आप उत्पन्न हुआ है और इसकी कब से पूजा की जा रही है इसकी ठीक ठीक से जानकारी नहीं है लेकिन यहां भव्य मंदिरों का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया है।जागेश्वर की देव मूर्तियां ब्रह्मकुंड में कुछ दिनों पड़ी रहीं. जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने इन मूर्तियों की पुनर्स्थापना की।

जागेश्वर

जागेश्वर धाम के बारे मे प्रचलित कथा
इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार माता पार्वती अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में बिना बुलाए अपने पति महादेव के साथ ‌चली गई ।जहां पर दक्ष प्रजापति ने उनके पति भगवान भोलेनाथ का घोर अपमान किया ।जिस से दुखी होकर मां पार्वती उसी यज्ञ कुंड में सती हो गई । माता पार्वती के वियोग में भगवान भोलेनाथ अत्यंत दुखी हुए। और उन्होंने उसी हवन कुंड की भस्म को अपने बदन में लगाकर जागेश्वर धाम की इस पावन धरती में ध्यान में बैठ गए। इन्हीं जंगलों में सप्त ऋषि भी अपनी पत्नियों के साथ रहते थे ।एक दिन सप्त ऋषियों की पत्नियों जंगल में आवश्यक चीजें (लकड़ी, फल,भोजन इत्यादि) लेने हेतु गई थी। तभी उन्होंने भगवान शिव को दिगंबर रूप में देखा और वह बेहोश हो गई। इधर सप्त ऋषि रात होने पर भी पत्नियों को वापस न लौटता पाकर अत्यंत चिंतित हो गए और उनकी खोज में निकल गए।

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उन्होंने देखा कि ध्यानमग्न महादेव के चारों ओर उनकी पत्नियां बेहोश पड़ी थी। किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए उन्होंने कुपित होकर महादेव को उनके लिंग बिच्छेदन का श्राप दे दिया। इससे चारों ओर हा-हाकार मच गया।तब महादेव ध्यान मुद्रा से बाहर निकले और उन्होंने सप्त ऋषियों को बिना कारण श्राप देने के दंड स्वरूप आकाश में तारों के साथ रहने का आदेश दिया।

जाने से पहले सप्त ऋषियों ने शिव के लिंग की स्थापना कर उसकी पूजा आराधना की। तभी से सप्त ऋषि आकाश में तारों के साथ हैं। इसलिए अकास मे स्तिथ तारामंडल को सप्तऋषि तारामंडल कहते है ।और उसी दिन से इस जगह पर भगवान भोलेनाथ के लिंग रूप की पूजा की जाती है। मंदिर परिसर में एक देवदार का वृक्ष सभी भक्तजनों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।यह वृक्ष देवदार का वृक्ष है जो नीचे से तो एक ही है लेकिन ऊपर जाकर वह दो भागों में विभाजित हो जाता है।देवदार के इस अद्भुत वृक्ष को माता पार्वती और शिव का युगल रूप का प्रतीक माना जाता है यानी की माता पार्वती और शिव यहां पर युगल रूप में साक्षात दर्शन देते हैं। वैसे भी भगवान शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में पूजा जाता है और यह पेड़ भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के उसी रूप को सार्थक करता हुआ नजर आता है। ऐसा वृक्ष इस देवदार के जंगल में और कहीं भी नहीं मिलता है।