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पहाड़ी टोपी | कुमाउनी टोपी | गढ़वाली टोपी | Pahadi Topi | Garhwali Topi | kumauni Topi

26 जनवरी 2022 के गणतंत्र समारोह में भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ब्रह्मकमल लगी हुई गांधी टोपी पहनी थी। जिससे उत्तराखंड वासी काफ़ी खुश हैं । क्योंकि ब्रह्मकमल लगी हुई पट्टी वाली गांधी टोपी को आजकल उत्तराखंड के कुमाऊ और गढ़वाल में  पहाड़ी टोपी के नाम से पहनते हैं। जबकि हिमाचल और जौनसार बावर क्षेत्र की अपनी पारम्परिक गोल पहाड़ी टोपी है। और कोई गोल टोपी में ब्रह्मकमल का प्रतीक लगा रहता है।

अब सोशल मीडिया पर ये बहस छिड़ गई है,कि जो टोपी मोदी जी ने पहनी थी, वो उत्तराखंड की पहाड़ी टोपी है। और कुछ समाचार चैनल ये बहस करते नजर आए कि , मोदी जी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी के सम्मान में ,उनकी तरह की टोपी पहनी थी। मतलब देश के कई सम्मानित मिडिया चैनलों को पता ही नही कि ये पहाड़ी टोपी है।

अब सवाल ये उठता है कि पहाड़ी टोपी क्या है ? और पहाड़ी टोपी उत्तराखंड में कहाँ से आई ?

जैसे कि लेख के प्रारंभ में हमने बताया कि गोल टोपी पहाड़ी टोपी हिमाचल और जौनसार क्षेत्र की पारंपरिक पहाड़ी टोपी है। जिसे अब लगभग पूरे उत्तराखंड के लोग धारण करने लगें है। दूसरी पहाड़ी टोपी है ,गांधी टोपी जिस पर पट्टी और ब्रह्मकमल का फूल लगा रहता है। इसे कुमाऊं और गढ़वाल के लोग धारण करते हैं ।और यही टोपी आज मोदी जी ने धारण की थी। जो कि चर्चा का विषय है।

पहाड़ी टोपी कहाँ से आई ?

अब अगला सवाल यह है,कि यह पहाड़ी टोपी कहाँ से आई ? ये टोपी कुमाउनी गढवाली संस्कृति से कैसे जुड़ी ?  उत्तराखंड के पहाड़ियों की अपनी कोई टोपी नही होती थी। उत्तराखंड के पहाड़ी लोगो का डांटा होता था, जो एक प्रकार की पगड़ी होती है। जिसे प्राचीन काल के राजा महाराजा और अन्य लोग धारण करते थे। पहाड़ी टोपी की उत्तराखंड की संस्कृति में जुड़ने की एक संभावना तब पैदा होती है,जब आदिगुरु शंकराचार्य उत्तराखंड आये। आदिगुरु शंकराचार्य के साथ कई मराठी ब्राह्मण भी उत्तराखंड आये जो यही बस गए। और उनका पहनावा टोपी धीरे धीरे उत्तराखंड की संस्कृति में अंगीकृत हो गया। जैसा कि हम सब को ज्ञात है कि इसी प्रकार की टोपी महाराष्ट्र राज्य में मराठी समुदाय के लोग करते हैं।

पहाड़ी टोपी
पारम्परिक पहाड़ी टोपी, फ़ोटो सभार अमेज़ॉन

अब आगे बढ़ते हुए उत्तराखंड के नवीन इतिहास में देखते हैं, तो गोरखा शाशन से भी ये टोपी नही जुड़ी है। क्योंकि गोरखा समाज की टोपी थोड़ा अलग होती है। फिर आगे बढ़ते हुए हम आते हैं भारत मे अंग्रेजी शाशन काल मे । हां यहाँ हमारे सवाल का जवाब मिल सकता है। अंग्रेजी शाशन काल मे स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े आंदोलन कारी या कह सकते हैं कि भारत की आजादी में सबसे बड़ा योगदान पूजनीय महात्मा गांधी जी का था। जो कि इतिहास के पन्नो में वर्णित है।ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार गाधी जी के समर्थक इसी प्रकार की टोपी पहनते थे ,जिसे गांधी टोपी कहा जाता है।एक जानकारी के अनुसार , रामपुरी टोपी को ही गांधी टोपी कहा जाता है। कहते हैं 1931 में जब महात्मा गांधी रामपुर मुहम्मद अली जौहर से मिलने गए तो ,उनके परिवार जनों ने एक हस्तनिर्मित टोपी बापू को उपहार स्वरूप दी। बाद में यही टोपी गाँधी टोपी के नाम से जानी गई। चूंकि उस समय उत्तराखंड के लोग और जन नेता महात्मा गांधी जी से काफी प्रभावित थे। गांधी जी की बताई राह पर स्वतंत्रता आंदोलन पर अग्रसर थे। इसलिए लाजमी है कि गांधी जी के समर्थक होने के कारण उनकी प्रसिद्ध टोपी गांधी का प्रयोग काफी करते थे। और जन नेताओ को देख कर आम जनता ने भी इस गांधी टोपी को अपनाना शुरू कर दिया, और धीरे-धीरे गांधी टोपी पहाड़ी टोपी बन गई । उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में गांधी जी का ज्यादा प्रभाव देखने को मिलता है। इसलिए कुमौनी लोग इस टोपी का प्रयोग ज्यादा करते हैं। गढ़वाल क्षेत्र के लोग भी इस टोपी का प्रयोग करते हैं , लेकिन कुमाऊं क्षेत्र की अपेक्षा थोड़ा कम। भारत स्वतंत्रता के दूसरे नायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी इसी प्रकार की टोपी का प्रयोग करते थे। और उत्तराखंड कई लोग आजाद हिंद फौज से जुड़े थे। इस उत्तराखण्डी टोपी के संदर्भ में एक रोचक किस्सा और है, कहते हैं स्वतंत्रता आंदोलन के समय सभी आंदोलनकारी सफेद गांधी टोपी पहनते थे। जिस कारण टिहरी के राजा को सफेद टोपियों से चिढ़ हो गई थी। और राजा ने इन टोपियों पर प्रतिबंध लगा दिया । इसी प्रतिबंध के कारण काली रंग की टोपियां चलन में आई।

उपरोक्त बातों से यह निष्कर्ष निकलता है, कि पहाड़ी टोपी उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल को स्वतंत्रता आंदोलन और गांधी जी की गाँधी टोपी की देन है। जिसने अब पारम्परिक पहाड़ी टोपी का स्वरूप ले लिया है। 

ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। कालांतर में किसी  ने इस टोपी पर एक पट्टी के साथ ब्रह्मकमल का प्रतीक चिन्ह लगाकर इसे एक नया स्वरूप दे दिया। धीरे -धीरे यह ब्रह्मकमल लगी हुई टोपी को लोग पसंद करने लगे और यह टोपी हमारी पारम्परिक टोपी बन गई ।और एक नई पहचान। और उम्मीद है कि मोदी जी के इस टोपी को धारण करने के बाद सारे देश मे इसकी पहचान उत्तराखण्डी टोपी के रूप में स्थापित हो जाएगी और उत्तराखंड की परंपराओं में भी।

“न्यूज़ जानकारी के अनुसार मोदी जी के लिये यह पहाड़ी टोपी  मसूरी स्थित सोहम आर्ट म्यूजियम द्वारा तैयार की गई है।

पहाड़ी टोपी
मोदी जी ने धारण की आधुनिक पहाड़ी टोपी फ़ोटो सभार -गूगल सर्च

सोहम के संचालक मसूरी निवासी समीर शुक्ला पिछले 20-25 साल से उत्तराखंड की धरोहरों को संजोने का कार्य कर रहे हैं। उनके अनुसार उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश में पहने जाने वाली पारम्परिक गांधी टोपी को एक नया लुक देकर एक नई पहचान दी है। अतः प्रथम जानकारी से अनुसार पारम्परिक पहाड़ी टोपी को ब्रह्मकमल और पट्टी वाला स्वरूप  सोहम आर्ट म्यूजियम ने दिया है। ”

 

धन्यवाद !

लेख :-

बिक्रम सिंह भंडारी !

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पहाड़ी टोपी का चित्र सभार euttaranchal.com से लिया गया है। ऑनलाइन पहाड़ी टोपी मगाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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