Saturday, June 15, 2024
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कुमाऊनी होली– 2 माह तक चलने वाली अनोखी है ये पहाड़ी होली।

होली सनातन परंपरा का प्रमुख त्यौहार है। भारत मे बहुत ही हर्षोल्लास के साथ यह त्यौहार मनाया जाता है। भारत के हर क्षेत्र राज्य में अलग अलग तरह से होली मनाई जाती है। इनमे से भारत मे दो होली उत्सव अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। उत्तराखंड की कुमाऊनी होली ( Kumaoni holi)और बरसाने की होली।

बरसाने की होली के साथ साथ उत्तराखंड की कुमाऊनी होली विश्व प्रसिद्ध है। कुमाउनी होली 2 से 3 माह तक चलने वाला संगीतमय त्यौहार है। कुमाउनी होली विश्व की सांस्कृतिक विरासत है। कई इतिहासकार कुमाउनी होली का संबंध चंद शाशनकाल से बताते हैं। इस होली के बारे बताया जाता है कि यह होली 1870 ई से वार्षिक उत्सव के रूप में चली आ रही है। उससे पहले होली की नियमित बैठकें हुवा करती थी।

कुमाऊनी होली

कुमाऊनी होली के प्रकार –

कुमाऊनी होली मुख्यतः शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत के मिश्रण पे गाई जाती है। उत्तराखंड की कुमाऊनी होली की भाषा ब्रज खड़ी बोली है। कुछ स्थानीय शब्दों का मिश्रण भी मिलता है। यह त्यौहार पौष मास से शुरू होता है। पौष माह से कुमाऊं के नैनीताल और अल्मोड़ा में बैठक होलियों का दौर शुरू हो जाता है। और फाल्गुन में कड़ी होली के साथ होलिका दहन के दिन तक चलता है। यह मुख्यरूप से तीन प्रारूपों में मनाया जाता है।

  1. ­खड़ी होली
  2. बैठकी होली
  3. महिला होली
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पौष के प्रथम रविवार से बैठकी होली शुरू हो जाती है। उसके बाद बसंत पंचमी के दिन से शृंगार रस प्रधान बैठकी होली चलती है। और फाल्गुन की एकादशी से खड़ी होली उत्सव शुरू होता है। खड़ी होली में ही रंगों का प्रयोग होता है। एकादशी के दिन रंग पड़ता है। कुमाऊं के कई क्षेत्रों में चीर बाँधकर होली का खड़ी होली का शुभारंभ होता है। चीर कपड़े के टुकड़ों एवं लकड़ी से मिला कर एक प्रतीकात्मक होलिका बनाई जाती है।

जिसका होलिका दहन के दिन दहन किया जाता है। एकादशी के दिन होलियार लोग मंदिरों में खड़ी होली गाकर ,खड़ी होली का शुभारंभ करते हैं। उसके बाद रोज बारी बारी से सबके घर होली गाई जाती है। होली गाने वाले लोगो को होलियार कहा जाता है। चतुर्दर्शी के दिन सब होलियार अपनी अपनी गांव की होली लेकर शिवमंदिर जाते हैं। भगवान शिव के आंगन में होली गाते है, “शिव के मन बसे काशी” इस होली की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

कुमाऊनी होली गीत ,” शिव के मन माहि बसे काशी ” –

शिव के मन माहि बसे काशी -2
आधी काशी में बामन बनिया,
आधी काशी में सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी।
काही करन को बामन बनिया,
काही करन को सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी।
पूजा करन को बामन बनिया,
सेवा करन को सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी
काही को पूजे बामन बनिया,
काही को पूजे सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी
देवी को पूजे बामन बनिया,
शिव को पूजे सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी
क्या इच्छा पूजे बामन बनिया,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी,

शिव के मन माहि बसे काशी
नव सिद्धि पूजे बामन बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी,

शिव के मन…

इसके अलावा “चलो चले शिव के भवन ” होली भी गाई जाती है।

महिला होली भी खड़ी होली के  बीच – बीच में चलती रहती है। इसमें केवल महिलाये नृत्य, गायन और ठिठोली से होली की खुशिया मनाती हैं। इसके अलावा पौष माह से चलने वाली बैठक होली का अपना एक अलग रंग होता है।  जिसमे उर्दू का असर भी मिलता है। इसे  बैठ कर हारमोनियम तबले के साथ राग रागनियों के साथ गाया जाता है।

इसे पढ़ेफूलदेई त्यौहार की कहानी। फुलारी त्यौहार की कहानी।

होलिका दहन के दिन , चीर दहन किया जाता है।चीर को प्रतीकात्मक होलिका माना जाता है। होलिका दहन के दूसरे दिन यानी  होली के अंतिम दिन , छलड़ी  मनाई जाती है। इस दिन गाँव मे घर घर जाकर , रंग खेला जाता है । और साथ मे होली आशीष गीत  भी गया जाता है। इसके उपरांत  गांव के सार्वजनिक स्थान पर होली का प्रसाद बनता हैं। होली के प्रसाद में हलुवा बनता है। यह प्रसाद समस्त ग्रामवासियों एवं सम्बंधियों में वितरित किया जाता है।

कुमाऊनी होली
कुमाउनी होली फोटो साभार फेसबुक

कुमाऊनी होली में छलड़ी के दिन आशीष गीत गाया जाता है। जो इस प्रकार है –

गावैं ,खेलैं ,देवैं असीस, हो हो हो लख रे
बरस दिवाली बरसै फ़ाग, हो हो हो लख रे।
जो नर जीवैं, खेलें फ़ाग, हो हो हो लख रे।
आज को बसंत कृष्ण महाराज का घरा, हो हो हो लख रे।
श्री कृष्ण जीरों लाख सौ बरीस, हो हो हो लख रे।
यो गौं को भूमिया जीरों लाख सौ बरीस, हो हो हो लख रे।
यो घर की घरणी जीरों लाख सौ बरीस, हो हो हो लख रे।
गोठ की घस्यारी जीरों लाख सौ बरीस, हो हो हो लख रे।
पानै की रस्यारी जीरों लाख सौ बरीस, हो हो हो लख रे
गावैं होली देवैं असीस, हो हो हो लख रे॥

उपसंहार –

होली समस्त भारत वर्ष का सबसे बड़ा एवं प्रिय त्यौहार है। और भारत की प्रसिद्ध कुमाऊनी होली उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान है। वर्तमान में उत्तराखंड की कई सांस्कृतिक पहचान के स्रोत विलुप्ति के द्वार पर खड़े हैं। जबकि प्रसिद्ध कुमाउनी होली की रंगत में खोए लोगों को देखकर सुखद अनुभूति होती है। उत्तराखंड की कुमाउनी होली अपने नित नए जोश और प्रेम से हर साल नए आयामो को छूती हैं।

इन्हे भी देखें –

कुमाऊनी होली गीत लिरिक्स | Kumauni holi song lyrics

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
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